बुधवार, 12 अक्तूबर 2016

एक सियार का दर्द


जैसा कि रोज का नियम था आज सुबह भी मैं घूमने निकला तो मुख्या सड़क छोड़कर पगडंडियों कि तरफ निकल गया. सुबह कि ताज़ी खुशगवार हवा का आनंद लेते हुए कुछ कदम ही चला था कि अचानक एक सियार से मेरा साक्षात हो गया, कुछ पल के लिए तो मैं भयभीत सा हो गया क्योंकि मैने सुन रखा था कि दो-चार सियार एक साथ मिलकर एक अकेले आदमी का तीया-पांचा कर सकते हैं, तो कुच्छ पल के लिए मैं घबराया मगर एक बात ने मुझे काफी राहत पहुंचाई, वह यह कि सियार बिलकुल अकेला था.
कुछ पल तो हम दोनों एक-दूसरे को देखते ही रह गए. मेरी तन्द्रा सियार ने ही भंग की. पहले तो उसने इधर-उधर निगाह दौड़ाई फिर उत्सुकतावश मेरी तरफ देखने लगा. उसकी भाव-भंगिमा से ऐसा आभास हो रहा था मानो वह अपनी व्यथा-कथा मुझे सुनाना चाहता हो.
होता आमतौर पर यह था कि सियार पहले भी मुझे आते-जाते कहीं ना कहीं मिलते थे पर ऐसा पहली बार हो रहा था कि सियार मेरे सामने जरा भी डरे या विचलित हुए उत्सुक नजरों से देखता खड़ा था.

अब मेरे मन में भी उत्सुकता पैदा हुई कि पहले तो सियार सामना होते ही डरकर अगल-बगल हो जाया करते थे पर इस सियार को आज यह क्या हो गया है कि मुझसे किनारा करने कए बजाय मुझसे कुछ कहने को उत्सुक दिख रहा है. मैंने मन ही मन सोचा कि चलो देखा जाए बात क्या है.
मै सियार कि तरफ बढ़ा. सियार जैसे अचानक नींद से जगा हो, मुझे अपनी तरफ बढ़ते देख वह घबराया और अपनी आदत के मुताबिक भागने कि मुद्रा बनाता दिखा तो मैंने उसे रोकते हुए कहा “अरे सियार भाई जरा रुको तो सही मुझे तुमसे कुछ बात करनी है. यह सुनकर सियार जरा ठिठका लेकिन फिर भागते हुए बोला
“नहीं आदमी भाई मैं आपसे बात नहीं कर सकता क्योंकि मेरी जान को खतरा हो सकता है".
 मैंने विस्मित होते हुए पूछा कि
“क्यों भाई तुम्हारी जान को किससे खतरा हो सकता है"
यह सुनकर सियार बोला
“मुझे आदमियों से ही खतरा है और चूंकि तुम भी एक आदमी ही हो इसलिए मैं कह सकता हूँ कि मुझे तुमसे भी खतरा है!"
 मुझे तो अभी तक मालूम ही नहीं था कि सियारों को आदमी से भी कोई खतरा हो सकता है! इसलिए मैनें सियार से पूछा कि
“हम आदमियों से तुम्हें क्या खतरा है? जरा खुलकर बताओ! फ़िलहाल मैं तुम्हें आश्वस्त करता हूँ कि तुम्हे मुझसे कोई खतरा नहीं है इसलिए जरा रुको और बताओ कि तुम्हारी परेशानी क्या है?"
 "और मुझे यह भी लग रहा है कि तुम मुझसे कुछ कहना चाहते थे! तो सारी बातें खुलकर कहो."
मेरी तरफ से ऐसा आश्वासन पाकर सियार कुछ आश्वस्त होता नजर आया. वह मेरे थोडा और नजदीक आकर रुक गया, फिर एक गहरी सांस लेकर बोला,
"क्या बताऊँ! कुछ समझ ही नहीं आता कि तुमसे क्या कहूं?" सियार कि बातें सुनकर मुझे लगा कि जरूर यह अपनी कोई पीड़ा या दुःख मुझे बताना चाहता है पर शायद मुझ पर विश्वास नहीं कर पा रहा है फिर भी मैंने कहा कि
"तुम मुझे अक्सर इन पगडंडियों में मिलते रहे हो और मेरा सामना न करके इधर-उधर हो जाते थे. फिर आज क्यूँ खड़े रहे और मुझे ऐसा क्यों लगा कि तुम मुझसे कुछ कहना चाहते हो!"
मेरी बात सुनकर सियार कुछ सोचता हुआ बोला
“हाँ आदमी भाई, मै सचमुच तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ और मैं सिर्फ तुमसे ही कहना चाहता हूँ क्योंकि मैं बहुत दिनों से तुम्हें देखकर महसूस कर रहा था कि तुम दयावान और प्रकृतिप्रेमी लगते हो इसलिए आज तुमसे बात करने कि हिम्मत जुटा पाया हूँ वरना हमारे सियार समाज में तो मनुष्यों से दूर ही रहने कि हिदायत दी हुई है"

सियार कि बातें सुनकर मैनें कहा
“सियार भाई, तुम मुझे ठीक समझ रहे हो अतः तुम मुझ पर विश्वास करके अपनी व्यथा-कथा कह सकते हो"
तब सियार ने कहना शुरू किया
“आदमी भाई, बुरा मत मानना! क्योंकि मैं जो कुछ कहने जा रहा हूँ वह तुम्हारी मानव बिरादरी के खिलाफ ही है. तुम मुझे भले आदमी लगे इसलिए तुमसे कहने की हिम्मत जुटा पाया हूँ"
मैने कहा
“खुलकर कहो, तुम्हे डरने की कोई जरूरत नहीं है"
 सियार ने कहा
“तुम्हें भी मालुम होगा कि हम सियार लोग तुम इंसानों की बस्ती के आस-पास भी रहना पसंद करते हैं और तुम्हें मालूम हो न हो मगर हमने तुम लोगों को कभी भी नुकसान नहीं पहुंचाया है, हाँ फायदा जरूर पहुंचाया है. तुम इंसानों की बस्ती के आस-पास जो भी गन्दगी रहती है उसे साफ़ करने में कुछ हद तक हम तुम्हारी मदद ही करते हैं फिर भी तुम आदमी लोग हमें कोई फायदा तो पहुंचा नहीं सकते उलटे हमारा ही सफाया करने पर तुले हुए हो. सियार कि बात सुनकर मैनें कहा कि तुम ऐसा कैसे कह सकते हो कि हम तुम्हारा सफाया करने में लगे हुए हैं? बताओ! क्या तुम्हें कोई आदमी मरना चाहता है या अभी तक किसी को मारा है? सियार ने कहा, नहीं ऐसी बात नहीं है, प्रत्यक्षतः तो ऐसा कुछ भी नहीं है पर अप्रत्यक्ष रूप से तुम आदमी लोग हम वन्य जीवों का बहुत नुकसान कर रहे हो. सबसे पहले तो तुम हमारे निवास स्थान जंगलों को ही काट-काट कर ख़त्म कर रहे हो जिससे हमारे रहने के लिए कोई सुरक्षित स्थान ही नहीं बच रहा है जहाँ पर हम स्वतंत्र रूप से विचर सकें. इसके बाद दूसरी सबसे बड़ी गलती तुम लोगों ने की है वह ए है कि सारे वातावरण में तुमने जहर घोल दिया है. जिन फैक्ट्रियों, कारखानों को तुम विकास का नाम दे रहे हो वाही हमारे विनाश का कारण बन रहे हैं. तुमने खेतों में उर्वरक और कीटनाशक रुपी जहर फैला दिया है जिसके दुष्प्रभाव से हम लोगों का जीवन बहुत कठिन होता जा रहा है और हमारी सियार जाति सहित कई और वन्य प्राणियों के विलुप्त हो जाने का खतरा पैदा हो गया है. यही सब बातें कहने के लिए मैं काफी दिनों से बेचैन था मगर कोई भला आदमी ना मिलने कि वजह से किसी से कुछ न कह सका. तुमको देखकर पता नहीं ऐसा क्यों लगा कि तुमसे ये सब बातें कही जा सकती हैं.  इसलिए हे भले आदमी, हमारी विनती सुनो और हमें ख़त्म होने से बचने में हमारी मदद करो इतना कहते-कहते ही सियार अचानक रूक गया और बोला “आदमी भाई कोई और आदमी तुम्हारे पीछे तरफ से आ रहा है इसलिए मैं चलता हूँ मगर हमारी समस्यायों पर ध्यान जरूर देना" यह कहकर सियार जंगल की तरफ निकल गया और मैं उसकी कही बातों के बारे में सोचता हुआ अपनी जगह पर ही खडा रह गया.
कृष्ण धर शर्मा

रेलवे स्टेशन


नारायण जी शासकीय स्कूल से हेडमास्टर की नौकरी से रिटायर होकर इसी छोटे से कस्बे राजनगर में बस गए थे क्योंकि उनके गाँव में पुश्तैनी संपत्ति के नाम पर मात्र एक कच्चा घर था जिसमें उनके दो भाई अपने बड़े परिवार के साथ रहते थे. उस मकान में अब और लोगों के रहने की वैसे भी गुंजाइश नहीं थी.
नारायण जी के पिताजी उत्तरप्रदेश के एक गाँव से बेहद ही गरीब परिवार से थे और भीख मांगकर गुजारा करते थे. बाद में उडीसा के किसी गाँव में उन्हें पुरोहित का काम मिल गया और गाँव वालों ने रहने के लिए एक कच्चा मकान भी दे दिया. पुरोहिती के काम से इन लोगों का गुजारा चल जाता था. नारायणजी तीन भाई और एक बहन थे जिनमे नारायणजी सबसे छोटे थे.
समय बीतता रहा. उस ज़माने में पढाई-लिखाई को ज्यादा महत्व नहीं दिया जाता था और आर्थिक स्थित भी कुछ हद तक इसके लिए जिम्मेवार मानी जाती थी इसलिए नारायण जी के भाई-बहनों ने शासकीय स्कूल में चौथी-पांचवी तक पढ़ कर छोड़ दिया मगर नारायण जी की पढाई में विशेष रूचि को देखकर गाँव के ही एक धनाढ्य एवं सज्जन व्यक्ति ने उन्हें आगे पढ़ने में सहयोग किया और इस तरह से नारायणजी की पढाई जारी रही और उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा अच्छे अंको से उत्तीर्ण कर ली. अब तक उनके बड़े भाइयों और बहन का भी शादी-ब्याह हो चुका था और उनके लिए भी रिश्ते आने शुरू हो गए थे मगर नारायणजी का कहना था कि अपने पैरों पर खड़े होने के बाद ही विवाह करना उचित होगा. उस समय मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण करना ही बड़ी बात थी अतः उन्हें बड़े आराम से शासकीय शिक्षक की नौकरी मिल गई मगर उन्हें अध्यापन हेतु राजनगर जाना पडा जो वहां से सैकडों मील दूर था. नौकरी तो करनी ही थी इसलिए नारायणजी को वहीँ पर किराये का घर लेकर रहना पड़ा. विवाह न करने के लिए भी अब उनके पास कोई बहाना न था इसलिए जल्दी ही उनका विवाह कर दिया गया. नारायणजी अपने परिवार से मिलने कभी-कभार छुट्टियों में ही जा पाते थे क्योंकि उन दिनों आने-जाने के साधन भी बहुत कम हुआ करते थे. छोटे परिवार का महत्व नारायणजी को पता था इसलिए उन्होंने हम दो हमारे दो के नारे पर अमल किया. बड़ी बेटी थी और छोटा बेटा था. नारायणजी ने बच्चों की पढाई-लिखाई पर विशेष ध्यान दिया जिसके परिणाम स्वरूप उनकी बेटी आगे चलकर डाक्टर बन गई और एक बहुत ही संपन्न परिवार में उसका ब्याह हो गया. बेटा भी पढाई-लिखाई में ठीक ही था. कद-काठी ठीक-ठाक थी अतः वह भी पुलिस में भर्ती हो गया और ट्रेनिंग के बाद पोस्टिंग भी इसी कस्बे में मिल गई. बेटे का ब्याह भी पास के ही शहर में हो गया. नारायणजी भी प्रोन्नत होकर अब हेडमास्टर बन चुके थे और इसी वर्ष वह भी रिटायर हुए.
नारायणजी ने काफी पहले से राजनगर में ही बसने का मन बना लिया था क्योंकि यह छोटा सा क़स्बा हरियाली से भी भरपूर था और प्रमुख राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित था. राजनगर में रेलवे स्टेशन भी था जहाँ पर कई पैसेंजर गाड़ियाँ रूकती थीं और आगे चलकर बड़ा स्टेशन बनने की पूरी सम्भावना थी. रिटायर्मेंट में मिले रुपयों से उन्होंने एक तीन कमरों का एक बढ़िया मकान बनाया. मकान के लिए जमीन उन्होंने पहले ही ले रखी थी. नारायणजी के यहाँ अब तक एक पोते और एक पोती का जन्म हो चुका था. बहू का स्वाभाव थोड़ा चिडचिडा था मगर नारायणजी और उनकी धर्मपत्नी सज्जन स्वाभाव के होने की वजह से उसे भी झेल जाते थे. समय बीतता रहा. नारायणजी के पोते-पोती अब बड़े हो गए थे और स्कूल भी जाने लगे थे नारायणजी के यहाँ सब ठीक ही चल रहा था कि उनकी धर्मपत्नी का टीबी की बीमारी से अचानक ही देहांत हो गया जिसके बाद नारायणजी एकदम टूट से गए और काफी अकेलापन महसूस करने लगे. टी.वी., कम्यूटर और मोबाईल के ज़माने में बूढों के पास बैठने का समय आजकल किसके पास है. उन्हें तब और झटका लगा जब बेटे के स्वभाव में भी कुछ परिवर्तन आना शुरू हुआ जिसे नारायणजी ने यह सोचकर टाल दिया कि नौकरी की वजह से थकावट हो जाती होगी इसलिए थोडा चिडचिडा हो गया है मगर जब बच्चों का भी उनके कमरे में आना-जाना बंद हो गया तब उन्हें लगा कि यह सब जानबूझकर किया जा रहा है! हो सकता है पत्नी की मृत्यु टीबी की बीमारी की वजह से हुई है शायद इसलिए उन्हें छुआछूत का डर लगता हो!.

नारायणजी समय बिताने के लिए सुबह-शाम टहलने जाने लगे. सुबह तो पास के बागीचे में चले जाते थे जहाँ पर लोगों की चहल-पहल देखकर ही समय कट जाता था और शाम के समय रेलवे स्टेशन जाने लगे जहाँ पर आठ-दस बूढ़े लोग एकत्रित होकर अपना सुख-दुःख साझा करते थे. बूढों की इस गोष्ठी में ग्राम पंचायत से लेकर संयुक्त राष्ट्र महासभा तक और नुक्कड़ नाटक से लेकर हालीवुड फिल्मों तक की समीक्षा होती थी कई छोटी-बड़ी असहमतियों के बावजूद डेढ़-दो घंटे की गोष्ठी आख़िरकार आपसी संधि पर आकर ख़त्म होती थी और अगले दिन मिलने के वादे के साथ गोष्ठी का समापन होता था.

एक दिन दोपहर के बाद नारायण जी काफी उदास और अकेलापन महसूस कर रहे थे तो उन्होंने सोचा क्यों न बच्चों के कमरे में चलकर बच्चों से कुछ बातें की जाएँ. वह बच्चों के कमरे में पहुंचे तो किताबें फैलाकर पढने का बहाना किये बच्चे मोबाईल पर गेम खेल रहे थे. दादाजी के अनपेक्षित आगमन पर बच्चे अचानक हडबड़ा गए और मोबाईल छुपाने लगे तो नारायण जी हँसते हुए कहने लगे
“तुम लोग पढने के बजाय मोबाईल पर गेम खेलते हो! मैनें तो देख लिया है अब छुपाने से भला क्या फायदा!”.
बच्चे एकदम से घबरा गए तभी बहू भी कमरे में आ गई और पूछने लगी
“क्या हो रहा है यहाँ पर?”.
नारायण जी कुछ कह पाते उसके पहले ही बच्चे बोल पड़े
“हम लोग तो चुपचाप पढाई कर रहे थे दादाजी ही आकर हमें डिस्टर्ब कर रहे हैं.”
नारायणजी कुछ सफाई दे पाते इसके पहले ही बहु शुरू हो गई “आपसे अपने कमरे में नहीं रहा जाता क्या? बच्चों को क्यों परेशान कर रहे हैं.”
नारायणजी का संयोग इतना ख़राब था की उसी समय उनका बेटा भी ड्यूटी से घर आ गया था और शोर-शराबा सुनकर वह भी पत्नी की बातों में आकर नारायणजी को भला-बुरा कहने लगा.
नारायणजी को इतना सब सुनने के बाद कुछ भी न सूझा तो वह अपने कमरे में आकर निढाल होकर बिस्तर पर गिर पड़े. क्या-क्या सपने नहीं देखे थे उन्होंने अपनी पत्नी के साथ मिलकर. हमारे दो ही तो बच्चे हैं, बेटी तो शादी के बाद अपने घर चली जाएगी और हमारा बेटा इतना संस्कारी है की लोगबाग भी इसकी तारीफ़ करते नहीं थकते, कहते हैं कि नारायणजी आपने अपने बच्चों को इतनी अच्छी शिक्षा और संस्कार दिए हैं. आपका बुढ़ापा तो अच्छे से कटेगा. बच्चों की तारीफ सुनकर नारायणजी गदगद हो जाते और एक सुन्दर और सुखद भविष्य (बुढ़ापे) की तस्वीर उनकी आँखों के सामने आकार लेने लगती. आज नारायणजी की आँखों में आंसू थे और मन बहुत भारी हो चुका था. उन्होंने घडी की तरफ देखा मगर अभी शाम होने में काफी समय था फिर भी उन्होंने अपने आंसू पोछे और छड़ी उठाकर रेलवे स्टेशन की तरफ चल पड़े.
 कृष्ण धर शर्मा

गंदे बालों वाली लड़की

महीनों तक सुबह की सैर के दौरान नियमित रूप से रोज अपने समय पर दिख जाने वाली उस गंदे और मैले-कुचैले कपडे पहने हाथ में प्लास्टिक की बोरी लिये कचरा बीनती हुई लड़की से आज बात करने की हिम्मत आखिरकार जुटाकर उसके पास पहुंचकर रुका ही था की अचानक मुझे अपने सामने पा कर वह गंदे बालों वाली लड़की घबरा सी गई और इधर-उधर देखने लगी. उसकी घबराहट देखकर थोड़ी देर के लिए तो मैं भी घबरा गया मगर फिर थोडा संयत होकर मैंने उसे आश्वासन देते हुए कहा “घबराओ मत, अगर तुम्हें परेशानी न हो तो मैं तुमसे कुछ पूछना चाहता हूँ!” मेरी बात सुनकर उसने जैसे पीछा छुड़ाने की नीयत से कहा “मुझे कुछ भी नहीं मालुम साहब” और मुड़कर जाने को हुई तब मैंने उसे फिर टोका “मुझे गलत मत समझो मैं एक शरीफ इंसान हूँ”. “तुम्हें महीनों से देख रहा हूँ और तुम्हारे बारे में मेरे मन में कई सवाल आ रहे हैं जिनका जवाब सिर्फ तुम्ही दे सकती हो, अगर तुम्हें कोई विशेष परेशानी न हो तो!”.
मेरी बात सुनकर वह ज़रा ठिठकी और बोली “मुझे देखकर तो लोग नाक-भौं सिकोड़कर निकल जाते हैं और आप कह रहे हैं कि मुझे देखकर आप के मन में कुछ सवाल आते हैं! मैं भी जानना चाहूंगी कि  मुझे देखकर आपके मन में क्या सवाल आते हैं?” उसकी ऐसी सपाट बातें सुनकर मैं सकपका गया फिर थोडा सम्हलकर बोला “मेरा कोई भी ऐसा मतलब नहीं था जो कि तुम्हें गलत लगे, मैं तो बस इतना जानना चाह रहा था कि तुम्हें तो और भी कई काम मिल सकते हैं फिर तुम यह कचरा बीनने का काम ही क्यों कर रही हो? क्या तुम्हारा मन नहीं होता कि तुम भी अच्छे कपडे पहनो, साफ-सफाई से रहो!”.
“ख़ुशी से कौन करता है यह सब साहब?”
“तब फिर क्यों करती हो यह सब!”.
“मजबूरी में करना पड़ता है”.
इस काम को करने की भी मजबूरी हो सकती है क्या!”.
“आप ठीक कहते हैं साहब, काम तो मुझे बहुत मिल जायेगा मगर इस काम में मैं अपने को सुरक्षित महसूस करती हूँ”.
“क्या बात कर रही हो! तुम अपने को इतना असुरक्षित क्यों महसूस करती हो? और कौन-कौन हैं तुम्हारे परिवार में?”.
“मैं और मेरी माँ बस इतना ही है मेरा परिवार”.
“तुम्हारे पिता!”.
“लगता है आप मेरी पूरी कहानी सुनना चाहते हैं!”.
मैंने थोडा असहज होते हुए कहा “ऐसी बात नहीं है फिर भी तुम अपनी कहानी मुझे बता सको और मैं तुम्हारी कुछ मदद कर सकूँ तो मुझे अच्छा लगेगा”.
“मेरी मदद आप क्या कर पाएंगे! फिर भी मैं सुनाती हूँ आपको अपनी कहानी”.
एक गहरी सांस लेकर उदासी भरे शब्दों में उसने कहना शुरू किया “हम लोग उड़ीसा के रहने वाले हैं. मेरे पिता पहले तो मजदूरी करते थे फिर बाद में ठेकेदारी करने लगे. मेरी बड़ी बहन और मैं हम दोनों ही माँ –बाप के दुलारे थे. हमारे पिता भी हमें बेटों से कम नहीं समझते थे और हमें इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ाते थे. हम लोगों का अपना घर नहीं था हम किराये से रहते थे. पिताजी इतना कमा लेते थे जिससे हमारा गुजारा आसानी से हो जाता था. मेरी बड़ी बहन १०वी और मैं १२वी में पढ़ रहे थे, सब ठीक-ठाक  चल रहा था कि अचानक एक दिन घर में खबर आई की पिताजी की हत्या हो गई है. हमारे ऊपर तो जैसे दुखों का पहाड़ ही टूट पड़ा यह खबर सुनकर. इस स्थिति की तो कल्पना तक नहीं की थी किसी ने भी. पुलिस की खोजबीन में पता चला कि किसी अन्य ठेकेदार से पिताजी का मामूली विवाद था जिसके कारण उस ठेकेदार ने पिताजी की हत्या करवा दी. वह ठेकेदार पकड़ा भी गया मगर पुलिस की लापरवाही और सबूतों के अभाव में उसे छोड़ भी दिया गया. उस ठेकेदार की बुरी नजर मेरी बड़ी बहन पर पड़ चुकी थी और जेल से छूट जाने के कारण उसका हौसला भी काफी बढ़ चुका था अब वह हमारे घर पर आकर हमें परेशान करने लगा. हमारा घर के बाहर निकलना मुश्किल हो गया था. एक दिन दीदी ने हिम्मत की और थाने पहुँच गई ठेकेदार के खिलाफ रिपोर्ट लिखवाने. रिपोर्ट तो क्या लिखते पुलिसवाले उलटे उन्होंने ठेकेदार को ही थाने बुलवा लिया और फिर ठेकेदार और कुछ पुलिसवालों ने दीदी के साथ बलात्कार किया और बेहोशी की हालत में सड़क के किनारे फेक कर चले गए. होश आने पर दीदी किसी तरह रोती-बिलखती हुई रात में घर पहुंची. अगले दिन सुबह जब हम मोहल्ले के नेता को लेकर फिर थाने पहुंचे तो हमें धमकाया गया कि हम किसी के सामने अपनी जबान न खोलें वरना अंजाम ठीक नहीं होगा चुप रहने में ही तुम लोगों की भलाई है. मगर दीदी चुप रहने वालों में से नहीं थी वह थाने के सामने ही धरने पर बैठ गई. शाम होते-होते दीदी को पुलिसवालों से मारपीट और दुर्व्यवहार करने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया और हवालात में डाल दिया गया. अगले दिन कोर्ट से जमानत का आदेश लेकर हम थाने पहुंचे तब तक काफी देर हो चुकी थी, इतनी बेइज्जती और जुल्म दीदी बर्दाश्त नहीं कर पाई थी और दुपट्टे से अपना गला घोट कर उसने अपनी जान दे दी थी. इस पूरी घटना के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हुई सिर्फ दो पुलिसवालों को सस्पेंड कर दिया गया और पूरा मामला दबा दिया गया.

अब ठेकेदार और पुलिसवाले हमारे घर आकर हमें परेशान करने लगे कि तुम लोग भी अपना मुह बंद रखना नहीं तो तुम्हारा भी यही अंजाम होगा. अपने पति और एक बेटी को खो चुकी मेरी माँ ठेकेदार की मुझ पर गन्दी नजर को पहचान गई थीं और उन्होंने एक बेहद ही कठोर फैसला लिया कि अब हम इस शहर को छोड़ देंगे. मैं अपना शहर छोड़ना नहीं चाहती थी मगर माँ की चिंता भी सही थी इसलिए हमें अपने शहर को छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा. घर से कुछ सामान समेटकर रात में हमने बिना किसी को बताये घर छोड़ दिया और रेलवे स्टेशन पहुंचे जहाँ रायपुर जाने वाली ट्रेन खड़ी थी हम उसमें बैठ गए और अगले दिन रायपुर पहुँच गए. स्टेशन से बाहर निकलकर तो हमें कुछ सूझ ही नहीं रहा था की हम कहाँ जाएँ और क्या करें, इस शहर में हमारा अपना कोई भी नहीं था जो कि हमें शरण दे सके या हमारी कोई मदद कर सके. पूरा दिन इसी उधेड़बुन में गुजर गया और रात हो गई. मजबूरन रात हमें स्टेशन के बाहर ही गुजारनी पड़ी मगर यहाँ पर भी कई जोड़ी हैवानी नजरें हमें रात भर घूरती रहीं. हम काफी निराश हो चुके थे कि स्टेशन में भीख मांगनेवाली एक बूढी माँ ने हमारी तकलीफ देखी और हमें सहारा दिया.वह हमें अपनी झोपडी में लेकर गई, हमें खाना खिलाया, आराम करने को कहा, हमारी दुखभरी कहानी  सुनी और हमें सांत्वना देते हुए कहा कि “तुम लोग घबराओ मत, मैं यहाँ अकेले ही रहती हूँ अब तुम लोग यहीं पर रहो.

हम तो ऐसा महसूस कर रहे थे जैसे डूबते को तिनके का सहारा मिल गया हो. अगले दिन मेरी माँ ने बूढ़ी माँ से कहा कि “मुझे भी कुछ काम करना चाहिए आखिर कब तक खाली बैठी रहूंगी!”. बूढी माँ ने कहा कि मैं तो रेलवे स्टेशन में भीख मांगकर अपना गुजारा करती हूँ तुमको भी यही करना हो तो मेरे साथ चल सकती हो या फिर ये काम पसंद न हो किसी के यहाँ झाड़ू-पोछा और बर्तन मांजने का काम भी मिल सकता है. “नहीं मेरी माँ यह सब नहीं करेगी” मैंने बीच में टोकते हुए कहा. “मैं इंग्लिश स्कूल में  दसवीं तक पढ़ी हूँ, मैं ट्यूशन पढ़ा कर गुजारा कर लूंगी”.  बूढी माँ थोड़ी सी दर्द भरी मुस्कराहट के साथ बोली “मेरे कहने का मतलब ये नहीं था बेटी कि तुम्हारी माँ भीख मांगे या किसी दुसरे के यहाँ झाड़ू-पोछा का काम करे. मैंने तो वही कहा जितनी मेरी सोच थी. तुम तो बहुत पढ़ी-लिखी हो बेटी जो करोगी ठीक ही करोगी” कहकर बूढी माँ चुप हो गई. मैं समझ गई थी कि बूढी माँ को मेरी बात का बुरा लगा था इसलिए मैंने बात को सम्हालते हुए कहा “नहीं माँ मेरा मतलब कुछ भी ऐसा नहीं था जिससे आपको दुःख पहुंचे, मैं तो बस ये कहना चाह रही थी मेरी माँ की हालत अभी इतनी अच्छी नहीं है कि  वह कोई मेहनत का काम कर सकें, वैसे आपने अपने परिवार के बारे में कुछ नहीं बताया माँ?” मैंने बूढी माँ को थोडा कुरेदते हुए कहा. बूढी माँ ने कहा “मेरे पति तो १० साल पहले ही मुझे छोड़कर चले गए थे और दो बेटों में मुझे अपने पास रखने को लेकर आये दिन झगडा होता रहता था और मुझे भी दोनों बेटे और बहु ताने मरते थे की पिताजी के साथ ही तुम क्यों नहीं मर गई. इन बातों से मुझे काफी दुःख होता था. एक दिन मैंने फैसला किया कि मेरी वजह से मेरे बेटों के परिवार में अशांति रहे इससे अच्छा है कि मैं मर ही जाऊं. मैं घर से अपनी जान देने के लिए ही निकली थी, कई दिन तक भटकती रही मगर मरने की हिम्मत न जुटा पाई और भटकते-भटकते रेलवे स्टेशन पहुँच गई और इसी बस्ती की एक बुढ़िया के साथ भीख मांगने लगी. उस बुढ़िया ने यहीं पर मेरी भी झोपडी बनवा दी और फिर मैं यहीं की होकर रह गई.“आपके बेटों ने आपको ढूँढने की कोशिश नहीं की?”. “उनको क्या गरज पड़ी थी बेटी! वह तो मुझसे छुटकारा ही पाना चाहते थे.”
फिर मेरे कहने पर बूढी माँ मुझे कई बड़े घरों में लेकर गई मगर ट्यूशन पढ़ाने के लिए किसी को जरूरत न थी आजकल सब के बच्चे कोचिंग क्लास जाने लगे हैं. घरेलु कामकाज के लिए नौकरानी के रूप में रखने को कई लोग तैयार थे. कोई चारा न देख मैनें घरेलु नौकरानी का काम करना स्वीकार कर लिया. वहां पर मुझे झाड़ू-पोछा, बर्तन मांजना, साफ़-सफाई और कपडे धोने, प्रेस करने का काम करना पड़ता था. मुझे काम करते हुए १ महीने ही हुए थे कि एक दिन मैं काम पर पहुंची तो पता चला कि मालकिन घर में नहीं हैं वह एक दिन के लिए बाहर गई थी. मैं लौटने ही वाली थी कि मालिक ने कहा “कोई बात नहीं है तुम झाड़ू-पोछा कर दो और बर्तन धुल दो बाकी काम कल आकर कर लेना जब मालकिन आ जाएगी. अभी तक ऐसी कोई हरकत मालिक या मालकिन ने नहीं की थी जिससे मुझे किसी भी तरह की शंका हो इसलिए मैं भी संकोचवश मना न कर सकी और काम करने लगी. काम होने के बाद मालिक ने कहा “कल आफिस जाने के लिए मेरे पास प्रेस किये हुए कपडे नहीं है १ जोड़ी कपडे प्रेस कर दोगी क्या!” मैनें कपडे प्रेस कर दिए और जाने के लिए निकली तब तक वह किचन से चाय बनाकर लाया था और मेरे सामने खडा हो गया. उसने कहा तुम काम करके बहुत थक गई होगी थोड़ी सी चाय पी लो” मुझे मालिक की आँखों में कुछ अजीब सा दिखा और मैं घबरा कर बहार की तरफ जाने लगी तो उसने मेरा रास्ता रोक लिया अब मैं बुरी तरह से घबरा गई और चिल्लाने लगी. मुझे चिल्लाते देख मालिक के होश उड़ गए, चाय का कप फेंक कर उसने जल्दी से मेरा मुह दबाया और बोला “चिल्लाना बंद करो पागल लड़की. तुमको जाना है तो जाओ कहकर उसने दरवाजा खोल दिया और मैं वहां से भागती हुई आकर सीधे माँ की गोद में गिर पड़ी. माँ भी एकदम से घबरा गई और रोते हुए पूछने लगी “क्या हुआ बेटी? तेरे साथ क्या हो गया?”. माँ को रोते हुए देख मैंने अपने आपको सम्हाला और पूरी बात बताई कि भगवान की कृपा से मेरे साथ कुछ भी गलत नहीं हुआ. मगर आगे भी कुछ गलत नहीं होगा इस बात की तसल्ली न माँ को थी न ही मुझे. रात में बूढी माँ के आने पर मैंने उन्हें जब पूरी बात बताई और मालिक के खिलाफ रिपोर्ट करने की बात कही तो बूढी माँ ने समझाते हुए कहा “किस-किस के खिलाफ रिपोर्ट करेगी बेटी! और तेरी रिपोर्ट लिखने वाले भी तो वैसे ही इंसान हैं न!.” अब मुझे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूँ! फिर बूढी माँ ने कहा अगर तू बुरा ना माने तो एक काम है जिसे तू कर सकती है!”. “आप बताओ क्या काम है”. बूढी माँ ने कहा “बेटी हमारे मोहल्ले की कुछ लड़कियां कचरा बीनने जाती हैं, दिखने में जरूर थोडा गन्दा लगता है मगर बेटी आमदनी भी अच्छी हो जाती उसमें. और अपना हुलिया थोडा बिगाड़ ले, घर के बाहर गंदे और मैले-कुचैले कपडे पहना कर और वैसी ही दिखा कर, इससे लोगों की गन्दी निगाहों से भी बची रहेगी.”

पहले तो मैनें बूढी माँ को साफ़ मना कर दिया ये काम करने के लिए मगर १-२ दिन में मुझे समझ में आ गया कि घर खर्च के लिए रुपया कमाने के साथ-साथ अपनी इज्जत बचाना भी जरूरी है, माँ को मैं भीख मांगते या किसी के घर बर्तन मांजते नहीं देखना चाहती थी इसलिए मैंने कचरा बीनने का काम करना शुरू कर दिया. शुरू में तो मुझे अजीब लगता था मगर अब कुछ भी बुरा नहीं लगता. गन्दी नाली और बदबूदार कचरे के ढेर से अपने काम की चीज उठाने में कोई संकोच नहीं लगता और सबसे अच्छी बात यह है कि मेरे मैले-कुचैले कपडे और मेरी जानबूझकर गन्दी बनाई हुई शक्ल देखकर अब लोगों की आंखों में अजीब से भाव नहीं दिखते बल्कि मुझे देखकर लोग नाक-भौं सिकोड़ते जल्दी से आगे निकल जाते हैं.
“मैं अब चलती हूँ साहब मेरी माँ मेरा इन्तजार कर रही होगी.” उसकी आवाज सुनकर जैसे मैं नींद से जागा, अभी तक मुझे ऐसा लग रहा था जैसे कोई फिल्म चल रही हो मेरे सामने. मैं भी उसे रोक न  पाया और उस गंदे बालों वाली लड़की को आँखों से ओझल होने तक देखता खडा रह गया. कृष्ण धर शर्मा 2014

सोमवार, 10 अक्तूबर 2016

ड्रग मार्केट में प्रतिस्पर्धा बढ़ाइए

यूपीए सरकार द्वारा लगभग 400 दवाओं के दाम तय कर दिये गये थे। वर्तमान एनडीए सरकार 450 और दवाओं के दाम निर्धारित कर दिये हैं। 350 और दवाओं के दाम निर्धारित करने की प्रक्रिया चल रही है। सरकार का यह कदम सही दिशा में है।
 

दवाओं के बाजार के दो हिस्से हैं। पहला हिस्सा जेनेरिक दवाओं का है। अकसर दवाओं में एक केमिकल होता है।
दवा को इस केमिकल के नाम से बेचा जा सकता है।  लेकिन कई कम्पनियां उस दवा को विशेष नाम से बेचती हैं। जैसे बुखार उतरने की दवा का मूल नाम पैरासिटामोल है। यह बाजार में पैरासिटामोल के नाम से भी उपलब्ध है। लेकिन दूसरी कम्पनियां इसी दवा को क्रोसिन अथवा सैरीडान के नाम से बेचती हैं।
जब किसी दवा को विशेष कंपनी द्वारा दिये गये नाम से बेचा जाता है तो उसे ‘‘ब्रैंडेड’’ कहा जाता है। इन दवाओं को बनाने पर कोई प्रतिबन्ध नहीं होता है। किसी भी कम्पनी द्वारा इसे बनाया और बेचा जा सकता है।
दवा कम्पनियां अकसर इन दवाओं को अत्यधिक उंचे दाम पर बेचती हैं। इनके द्वारा एडवरटाइजमेंट किये जाते हैं। सेल्स रिप्रेजेन्टेटिव की बड़ी फौज तैनात की जाती है। डाक्टरों को गिफ्ट एवं कमीशन दिये जाते हैं। जैसे किसी दवा को एक कम्पनी 10 रु. में बेच रही है। उसी दवा को दूसरी कम्पनी अपना ब्राण्ड लगाकर 50 रु. में बेचती है। इस 50 रु. में से वह 10 रु. का कमीशन डाक्टरों को दे देती है। डक्टर मरीजों को 50 रु. की महंगी दवा लिख देते हैं। मरीजों को इस बात का भान ही नहीं होता कि यही दवा कम दाम में उपलब्ध है।
इन दवा के दाम पर नियंत्रण करने का अधिकार सरकार के पास ड्रग प्राइस कंट्रोल आर्डर के अंतर्गत है। सरकार की मंशा है कि अधिक मात्रा में दवाओं को मरीजों को उचित दाम पर उपलब्ध कराया जाये। लेकिन प्रशासनिक स्तर पर मूल्य निर्धारण में कई समस्याएं हैं। पहली समस्या भ्रष्टाचार की है। ड्रग इन्सपेक्टर को घूस खाने के अवसर खुल जाते हैं। दूसरी समस्या है कि मूल्य को लेकर विवाद बना रहता है।

ड्रग कम्पनियों की शिकायत रहती है कि मूल्य नीचे निर्धारित किये गये हैं जबकि जनता की शिकायत रहती है कि ये ऊंचे हैं। तीसरी बड़ी समस्या यह है कि लगभग 900 दवाओं को बनाने वाली सैकड़ों कम्पनियों पर निगरानी रख पाना दुष्कर कार्य है। चौथी समस्या है कि दवा की गुणवत्ता की जांच करना कठिन होता है। सरकार द्वारा दाम कम निर्धारित करने पर कम्पनी द्वारा दवा की गुणवत्ता को गिराया जा सकता है। इसलिये मूल्य निर्धारण को जरूरी परन्तु अल्प कालिक उपाय मानना चाहिये। दवाओं के मूल्य न्यून बने रहें इसके लिये दूसरे कदम भी सरकार को उठाने चाहिये।
पहला कदम है कि सामान्य दवाओं पर ब्राण्ड लगाने पर प्रतिबन्ध लगा दिया जाये। साथ-साथ डाक्टरों पर प्रतिबन्ध लगाया जाये कि वे जेनेरिक दवाओं के पर्चे लिखें व निर्माता कम्पनी का नाम पर्चे पर न लिखें। जैसे डाक्टर को बुखार कम करने के लिये पैरासिटामाल दवा लिखनी है। मरीज के प्रिस्कृप्शन पर पैरासिटामोल ही लिख दिया जाये न कि क्रोसिन अथवा सैरीडान। किसी कम्पनी का नाम भी न लिखा जाये। ऐसा करने से मरीज पर अपने विवेक से दुकान से किसी भी कम्पनी द्वारा निर्मित पैरासिटामाल दवा खरीदी जा सकती है। ड्रग कम्पनियों एवं डाक्टरों के अपवित्र गठबन्धन द्वारा मरीज को अनायास महंगी दवा खरीदने की मजबूरी नहीं रहेगी।
साथ-साथ सरकार को दवाओं का परीक्षण कराना चाहिये। तमाम अध्ययन बताते हैं कि अकसर गोलियों में बताई गई मात्रा से कम दवा होती है। सरकार को चाहिये कि तमाम कम्पनियों द्वारा बनाई गयी दवाओं का परीक्षण कराये। फिर परीक्षण के परिणामों को सरकारी बेबसाइट पर डाले। दुकानदारों को निर्देश दिया जाये कि परीक्षण रिपोर्ट को दुकान में टांगे। तब खरीदार देख सकेगा कि किस कम्पनी बनाई गयी दवा कितनी कारगर है और उसका क्या दाम है। वह अपने विवेक के अनुसार दवा खरीद सकेगा। इन कदमों का प्रभाव दीर्घ कालिक होगा। भ्रष्टाचार के अवसर भी नहीं खुलेंगे।
दवाओं का दूसरा हिस्सा पेटेंटीकृत दवाओं का है। ड्रग कम्पनियों द्वारा नई दवाओं का आविष्कार किया जाता है। इन दवाओं पर कम्पनी द्वारा पेटेंट हासिल किया जाता है। पेटेंट कानून के तहत इन दवाओं को बनाने एवं बेचने का एकाधिकार पेटेंट धारक कम्पनी के पास रहता है। पेटेंट  धारक कम्पनी द्वारा 20 वर्षों तक दवाओं को मनचाही कीमतों पर बेचा जाता है। ड्रग कम्पनियों का तर्क है कि दवा के अविष्कार में उनके द्वारा भारी निवेश किया गया है।

इस निवेश को वसूल करने के लिये उन्हें दवा के ऊंचे दाम रखना अनिवार्य है। यह छूट उन्हें मिलनी ही चाहिये चूंकि ऊंचे मूल्य पर बेचकर कमाये गये लाभान्श से ही वे आगे रिसर्च में निवेश कर सकेंगे और नई दवा का आविष्कार कर सकेंगे। ड्रग कम्पनियों की यह दलील सही भी है। दरअसल नई दवाओं की खोज ने मरीज को अपनी बीमारी के साथ जीने का तरीका दिया है। वे कई दशक तक दवाओं का सेवन करते हुये जी लेते हैं। तात्पर्य यह कि यदि नई दवाओं की खोज न हुयी होती तो यह उपचार सम्भव न हो पाता।
बावजूद इसके, पेटेंटीकृत दवाओं के दाम पर भी कुछ नियंत्रण जरूरी है। कारण कि ड्रग कम्पनियों द्वारा कमाये गये लाभ का एक अंश ही भविष्य की रिसर्च में निवेश किया जाता है। शेष लाभ मालिकों अथवा शेयर धारकों को वितरण किया जाता है। इन दवाओं के उंचे मूल्य से मरीज भी सीधे प्रभावित होते है। यहां प्रश्न संतुलन का है। एक ओर पूर्व में किये गये निवेश की वसूली तथा भविष्य में किया जाने वाला निवेश है। दूसरी ओर मरीज का हित है। दोनों तर्क मजबूत हैं और किसी वैज्ञानिक कसौटी पर दाम तय कर पाना कठिन है।

यह निर्णय राजनैतिक है। सरकार को अपने विवेक से इस संतुलन को स्थापित करना चाहिये। केन्द्र सरकार ने पेटेंटीकृत दवा के दाम निर्धारित करने को एक कमेटी सन् 2007 में बनाई थी। इस कमेटी ने पांच वर्षों के बाद अपनी रपट प्रस्तुत की। इस रपट पर निर्णय लेने के लिये दूसरी कमेटी वर्तमान में विचार कर रही है। सरकार को चाहिये कि इस प्रकार की ढिलाई पर सख्त कदम उठाये और पेटेंटीकृत दवाओं के मूल्य निर्धारण की पालिसी शीघ्र बनाकर देश की जनता को राहत दे।

डॉ. भरत झुनझुनवाला