रविवार, 12 जून 2016

देहाती लड़की का प्रेम


देहाती लड़की प्यार भी करती है
ठेठ देहातीपन से अपने प्रेमी को
नहीं आते हैं उसे नये ज़माने के
नाज-नखरे और ताम-झाम
रूठने-मनाने को ही समझती है वह प्रेम
या फिर प्रेमी के साथ बैठकर
बुनती है वह सुनहरे भविष्य के सपने
हाँ मगर उसके सपने भी होते हैं उतने ही बड़े
जो समां सकें प्रेमी की चादर में
भांप लेती है वह प्रेमी के चेहरे के भाव
खुश है या उदास या फिर है नाराज
चिंता भी करती है वह आजकल
क्योंकि अब अक्सर जाने लगा है
उसका प्रेमी पास ही के शहर घूमने
सुन रखा है उसने किसी के मुंह से
शहर की लड़कियां बड़ी तेज होती हैं
वह समझाना चाहती है अपने प्रेमी को
मगर यह सोचकर चुप रह जाती है कि
नाराज न हो जाये उसका प्रेमी
उसकी चिंता को लांछन समझकर
इसलिए करती है वह शिवजी की पूजा
पूरे मनोयोग से, जतन-विधान से
ताकि प्रेमी उसका बचा रहे
दुनिया की बुरी नजरों से
                  (कृष्ण धर शर्मा, २०१६)

रविवार, 5 जून 2016

लड़ाई का विकल्प


क्या लड़ना ही बचा है
आखिरी विकल्प !
जैसा कि होता आया है
आदिकाल अनादिकाल से
जैसे रामायण में महाभारत में
जैसे सुरासुर संग्राम में
जैसे भारत और पाकिस्तान में
जैसे हिन्दू और मुसलमान में
क्या दोनों पक्ष एक नहीं हो सकते
अपने-अपने अहंकार छोड़कर
मतभेदों की दीवार तोड़कर
क्यों इस अहं की लड़ाई में
शामिल होते जा रहे हैं समझदार भी
क्या समझदारी के मायने बदल चुके हैं!
क्या कुछ हारकर भी
बहुत कुछ जीत लेने की समझदारी
नहीं बची है इन समझदारों में
या नहीं बचा है धैर्य!
इस अंतहीन लड़ाई का मकसद क्या है?
दुश्मन को जीत लेने पर
क्या बंद हो जाती हैं लड़ाइयाँ!
                        (कृष्ण धर शर्मा, २०१६)

10x10 की जिंदगी


10x10 की जिंदगी भी जिंदगी ही होती है
10x10 में रहनेवालों के भी सपने होते हैं
जैसे कि 100x100 या 1000x1000 में
रहने वालों के होते हैं
10x10 के कमरे में भी
चल जाती है गृहस्थी
बेडरूम किचन और पूजाघर
भी होते हैं 10x10 में
जरा छोटे तो होते हैं आकार में
मगर सुख भरपूर रहता है
फोन करके नहीं ढूंढना पड़ता है
मिल जाते हैं एक ही कमरे में सब
एक-दूसरे की दुःख-तकलीफ और पीड़ा
महसूस और साझा करते हैं
खाने के समय के अलावा भी
दिन में कई बार मिलते हैं आपस में
10x10 में रहनेवाले
कुल मिलाकर अगर यह कहें कि
10x10 में रहने वाले एक शानदार
जीवन जीते हैं 100x100 या
1000x1000 वालों की तुलना में
तो अतिश्योक्ति तो कतई न होगी

                  (कृष्ण धर शर्मा, २०१६)

और वह सो गया


वह जागना चाहता था मगर उसे कहा गया
अभी मत जागो, अभी सुबह नहीं हुई है
उसने भाई से पूछा सुबह हो गई है न!
भाई ने उसे समझाते हुए कहा
नहीं अभी सुबह होने में काफी समय है
तुम सो जाओ
उसने बहन से पूछा सुबह हो गई है न!
बहन ने भी वही जवाब दिया
पिता ने भी वही जवाब दिया 
माँ ने भी वही जवाब दिया
फिर उसने अस्पताल की खिड़की से
अन्दर आ रही सूरज की किरणों से पूछा
सुबह हो गई है न!
सूरज की किरणों ने उसके
माँ, बाप, भाई, बहन की तरफ देखा
उनकी आँखों में दर्दभरी याचना थी
कि न बताया जाये उसे सुबह होने के बारे में
ताकि कुछ देर और सो सके वह
उसके घावों को भरने के लिए
मिल सके कुछ और समय
और तब तक अस्पताल के बाहर
फ़ैली हुई अराजकता और उन्माद भी
हो सकता है कम हो जाये
हो सकता है ख़त्म हो जाये
और फिर सूरज की किरणों ने भी
दोहराया वही सब
जिसे दोहरा चुके थे सुबह से अनेकों लोग
सूरज की किरणों ने कहा इसलिए
उसे अब संशय नहीं रहा
अब वह आश्वस्त होकर सो गया
गहरी और शांत नींद में
            (कृष्ण धर शर्मा, २०१६)

घाटी का दर्द


एक घाटी
जो जार-जार रोती
दिन भर वाहनों के शोरोगुल से
रही आक्रांत
हैरान और परेशान  
जो रात में चाहे विश्राम
मगर सो न पाती
इंसानों की दिन-रात चलने की हवस
उसे सोने न देती
डर है कि कहीं घाटी
जो दिन-रात सो न पाती
नाराज गर हुई तो
आफत ही फिर आ जाती 
स्वार्थी मानव आबादी
फिर चीखती चिल्लाती
घाटी मगर चाहकर भी
इनपर रहम न कर पाती
                 (कृष्ण धर शर्मा, २०१६)