रविवार, 24 अप्रैल 2016

इंसान का स्वार्थ


लेकिन नदी तो खाली हो चुकी है
फिर तुम तैरने कहाँ जाओगे            
चिड़िया के बच्चे ने अपनी माँ से कहा
क्या कह रही हो माँ! ऐसा कैसे हो सकता है!
“इंसान सब कुछ कर सकता है
अपने स्वार्थ के लिए”
नदियों से पानी गायब कर सकता है
रेगिस्तान से रेत गायब कर सकता है
खेतों से फसलें गायब कर सकता है
जंगलों से पेड़ गायब कर सकता है
बच्चों का बचपन छीन सकता है
वह सब कुछ गायब कर सकता है
जो भी उसके स्वार्थ के आड़े आ सकता है
“मगर यह सब करने से तो
इंसान खुद ही मुश्किल में पड़ सकता है!
“हाँ इंसान को यह सब पता होता है”
“तो क्या इंसान अपने बच्चों को भी
स्वार्थवश मुश्किल में डाल सकता है!
“हाँ, इंसान अब सिर्फ अपनी परवाह करता है”
                           कृष्ण धर शर्मा २०१६

शनिवार, 9 अप्रैल 2016

ये बच्चे जन्म से अपराधी नहीं होते, इन्हें बनाया जाता है

नारीवादी कार्यकर्ता और 'संगत-साउथ एशियन फेमिनिस्ट नेटवर्क' की सलाहकार कमला भसीन का कहना है कि समाज में जिस तरह महिलाओं के खिलाफ अपराध बढ़ रहे हैं और इनमें किशोरों की संलिप्तता बढ़ती जा रही है, ऐसे में कानून में बदलाव लाने से ज्यादा महत्वपूर्ण है कि समाज अपनी मानसिकता में बदलाव लाए। देश की राजधानी में 16 दिसंबर, 2012 को घटित क्रूरतम सामूहिक दुष्कर्म की घटना ने सबका ध्यान 18 साल के उस किशोर की ओर खींचा, जो इस दुर्घटना का मुख्य अरोपी था। दोषी किशोर को अदालत द्वारा किशोर न्याय अधिनियम (2000) के तहत तीन साल तक बाल सुधार गृह में रखा गया और अवधि पूरी होने पर रिहा कर दिया गया। लेकिन जनता इस अपराधी किशोर को माफ करने को तैयार नहीं है। निर्भया की मां आशा देवी सहित दिल्ली की महिलाएं उसे फांसी पर झूलता देखना चाहती हैं। गौरतलब है कि रविवार को तीन साल की सजा पूरी होने के बाद किशोर को रिहा किया गया, लेकिन उसकी रिहाई से कुछ दिन पहले से ही लोगों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया और उसे रिहा न करने और अधिनियम विधेयक में संशोधन की मांग की। स्वयं निर्भया की मां ने किशोर को फांसी की सजा देने की मांग करते हुए जमकर विरोध प्रदर्शन किया। लोकसभा में सात मई, 2015 को किशोर न्याय अधिनियम (2000) विधेयक में संशोधन पारित हो गया। इस विधेयक के साथ जघन्य अपराध करने वाले 16-18 आयुवर्ग के बच्चों पर वयस्कों की तरह मुकदमा चलाए जाने के प्रावधान का रास्ता साफ हो गया, जिसके बाद मंगलवार को राज्यसभा में भी किशोर न्याय अधिनियम (बाल देखभाल और संरक्षण), 2015 पास कर दिया गया। जब इस बारे में कमला भसीन से पूछा, तो उन्होंने कहा, "कानूनों में बदलाव लाने के बजाय समाज की मानसिकता में बदलाव लाना होगा। ऐसे मामलों में संलिप्त 16 से 18 साल उम्र के बच्चे बहुत ज्यादा नहीं होंगे। ये बच्चे जन्म से अपराधी नहीं होते, इन्हें बनाया जाता है।" भारत में वर्ष 2011 में 16-18 आयुवर्ग के 33,000 किशोरों को गिरफ्तार किया गया था। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार, पिछले साल भारतीय दंड सहिता (आईपीसी) तथा विशेष और स्थानी कानून (एससीसी) के तहत किशोरों के खिलाफ 43,506 आपराधिक मामले दर्ज किए गए थे, जिसमें से 28,830 अपराध 16-18 आयुवर्ग के किशोरों ने किए थे। कमला भसीन ने बताया, "इस तरह के आंकड़े सामने आते रहते हैं, लेकिन इन आंकड़ों से अधिक महत्व है इस बात पर ध्यान देना कि आखिर इनमें बढ़ोतरी क्यों हो रही है? इस तरह के अपराधों को अंजाम देने वाले ज्यादा बच्चे गरीब तबके से आते हैं, जिनके साथ शोषण किया जाता है।" कमला भसीन ने कहा, "ये बच्चे जन्म से अपराधी नहीं होते, समाज इन्हें अपराधी बनने पर मजबूर करता है।" कमला से जब पूछा गया कि दिल्ली महिला आयोग (डीसीडब्ल्यू) अध्यक्ष स्वाति मालिवाल द्वारा किशोर की रिहाई में रोक लगाने की याचिका और निर्भया की मां तथा देश की अधिकांश जनता द्वारा की जा रही फांसी की सजा की मांग कहां तक सही है?, तो उन्होंने कहा, "सबसे पहले तो यह देखना चाहिए कि मेरे लिए न्याय का मतलब क्या है? बदला लेना? अगर अदालत भी हत्या की सजा देने लग जाएगी, तो फिर कानून बनाने का क्या मतलब रह जाएगा? एक तरफ हम सजा की मांग करते हैं और दूसरी तरफ समाज बच्चों का शोषण करता है। हम ही उन बच्चों को बाल मजदूरी के लिए मजबूर करते हैं और हम ही हर प्रकार से इनका शोषण करते हैं और फिर सजा की मांग भी हम ही कर रहे हैं।" रविवार को बाल सुधार गृह से रिहा हुए किशोर को गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) भेजा जाएगा। कमला भसीन से जब पूछा गया, कि क्या ऐसे में किशोर में बदलाव संभव है? इस पर उन्होंने कहा, "वह भी हमारे देश का बच्चा है। यहां एक इंसान को सुधारने की बात की जा रही है। हर इंसान में बदलाव हो सकता है। हर व्यक्ति को अपनी गलती का एहसास हो सकता है। लोग कह रहे हैं कि इसमें बदलाव नहीं हुआ है, तो यह बताइए कि इसके लिए कौन जिम्मेदार है?" कमला भसीन ने आगे कहा, "एक तरफ हम स्मार्ट सिटी और अन्य बड़ी परियोजनाओं पर लाखों-करोड़ों रुपये खर्च करने के लिए तैयार हैं, लेकिन दूसरी ओर यह देखिए कि हम इन किशोरों के जीवन में सुधार के लिए क्या कर रहे हैं। सजा से अपराध कम नहीं होते, हमारी सोच-विचार से अपराधों में कमी आएगी। अगर सजा-ए-मौत देने से अपराधों में कमी आती, तो फिर कोई अपराध होता ही नहीं, जितने पैसों में इन बड़ी परियोजनाओं में काम हो रहा है, उतने में तो न जाने कितने किशोरों के जीवन में सुधार लाया जा सकता है।" कमला भसीन पिछले 40 सालों से महिला अधिकारों के लिए लड़ रही हैं और वह अपने बाल्यकाल में स्वयं शोषण का शिकार हुई हैं। उन्होंने कहा, "इस तरह के अपराध, जो बढ़ रहे हैं उनके पीछे कई मुख्य कारण हैं। पॉर्न फिल्में और 'शीला की जवानी', 'मैं तंदूरी मुर्गी हूं' जैसे गाने समाज में गंदगी फैला रहे हैं। ऐसी चीजें लड़कियों-महिलाओं को एक चीज के रूप में प्रस्तुत करती हैं। इसके अलावा समाज से पितृसत्ता की मानसिकता को जड़ से उखाड़ कर फेंकना होगा, जो महिलाओं को कमतर समझती है।" कानून में बदलाव को लेकर कमला भसीन ने कहा, "संविधान में जहां एक ओर पुरुष औ महिला के बीच समानता की बात की गई है, वहीं दूसरी ओर इसके उलट महिलाओं को कमजोर माना जाता है और सबसे बड़ी बात की महिलाओं ने समाज की इज्जत का बीड़ा उठाया हुआ है। अगर उनकी इज्जत चली जाती है, तो समझ लिया जाता है कि परिवार की इज्जत चली गई।" उन्होंने बताया कि 40 प्रतिशत पुरुष अपनी पत्नी पर हाथ उठाते हैं। यह सारी चीजें घर से शुरू होती है, जहां पति को मालिक बना दिया जाता है। उनके अनुसार, यह संविधान के खिलाफ है। यह वो समाज है जो महिलाओं को कमतर समझता है। कमला भसीन ने लड़कियों को दिए गए अपने संदेश में कहा, "मैं कहना चाहती हूं कि वह बाहर निकलें। इससे बहुत फर्क पड़ेगा। इस तरह के अपराधों का सामना करने वाली लड़कियों को इसके खिलाफ खड़ा होना चाहिए। डर के घर में नहीं बैठिए, बाहर आइए और संविधान में समानता की जो बात कही गई है, उसे सच कीजिए।" (कमला भसीन)

ड्रग आतंकवाद का नया खतरा

संयुक्त राज्य अमेरिका के नेतृत्व में वर्ष 2001 में 'वार इन्ड्यूरिंग फ्रीडमÓ की शुरुआत हुई थी। उस समय दुनिया को यह आश्वासन दिया गया था कि अमेरिकी युद्ध अब आतंकवाद के समाप्त होने के साथ ही समाप्त होगा। भारत भी 80 की दशक से आतंकवाद की चपेट में है और अब तक काफी मानवीय व आर्थिक नुकसान उठा चुका है। कई बार वह इसे नेस्तनाबूद करने के लिए तिलमिलाया भी, लेकिन सच तो यही है अब इस युद्ध के डेढ़ दशक बाद भी दुनिया के साथ-साथ भारत कहीं ज्यादा अधिक असुरक्षित महसूस करता है। सवाल यह उठता है कि आखिर वजह क्या है? सवाल यह भी है क्या आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक लड़ाई या हमारी घरेलू कार्रवाई में आतंकवाद की नाभि पर हमला किया गया? क्या उसकी रक्तवाहिनियों (यानि वे स्रोत जो इसके लिए फंडिंग करते हैं, जिनमें से ड्रग ट्रैफिकिंग बेहद महत्वपूर्ण है) को नष्ट किया गया? क्या इन महत्वपूर्ण तंतुओं को समाप्त कर पाने की असफलता के कारण ही आज ड्रग आतंकवाद का खतरा हमारे सामने एक अहम् चुनौती बनकर नहीं उभर आया है? भारत के लिए ड्रग आतंकवाद भले ही नया शब्द हो लेकिन वैश्विक स्तर पर इसका चलन एक दशक पहले ही हो चुका है। एंटी टेररिस्ट अध्येयता इस ओर सदी की शुरूआत से ही ध्यान आकर्षित कर रहे हैं लेकिन वैश्विक ताकतों ने अब तक इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाए। अमेरिकी फेडरल ब्यूरो ऑफ इनवेस्टीगेशन (एफबीआई) ने कुछ समय पहले स्पष्ट किया था कि अंतरराष्ट्रीय मादक पदार्थो की तस्करी तथा आतंकवाद के मध्य एक 'खतरनाक समिश्रÓ तैयार हो चुका है। उसका यह भी कहना था कि दुनिया तेजी से आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक और प्रौद्योगिकीय परिवर्तनों से गुजर रही है और इन विश्वव्यापी परिवर्तनों का परिणाम यह हुआ कि तमाम छितरे हुए जटिल और अधिक असंयमित (असिमेट्रिक) खतरे उत्पन्न हो चुके हैं। हालांकि एफबीआई ने अमेरिका के लिए ही इन खतरों को सर्वाधिक चुनौतीपूर्ण माना है लेकिन सच तो यह है कि ये खतरे पूरी दुनिया के अधिकांश देशों के लिए उतने ही चुनौतीपूर्ण हैं जितने कि अमेरिका के लिए। विशेष बात यह है कि नये विज्ञान, तकनीक और आर्थिक परिवर्तनों के कारण तेजी से सिकुड़ रही दुनिया का लाभ आतंकवादियों, अपराधियों और विदेशी खुफिया संग्राहकों (फॉरेन इंटेलीजेंस कलेक्टर्स) ने तेजी उठाया है। यद्यपि ये संयुक्त गतिविधियां सुस्पष्ट नहीं हैं लेकिन उनकी प्रतिध्वनियां राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन चुकी हैं। दुनिया भर के विभिन्न समाचार पत्रों में छपी रिपोर्टों पर निगाह डालें तो पता चलेगा कि पिछले लगभग एक दशक से (कम से कम उस समय से अवश्य ही जब अल जवाहिरी ने अलकायदा इन इस्लामी मगरिब यानि एक्यूआईएम की स्थापना की थी) आतंकवाद और अपराध अभिन्न रूप से जुड़ चुके हैं। अंतरराष्ट्रीय और घरेलू आतंकवादी संगठन और उनके समर्थक असंख्य अपराधों में संलग्न हैं क्योंकि आपराधिक गतिविधियों से संचित निधियां आतंकी गतिविधियों के लिए फंडिंग का जरिया बनती है। इन अपराधों में जबरन वसूली, अपहरण, डकैती, भ्रष्टाचार, विदेशी तस्करी, हथियारों की तस्करी, साइबर अपराध, व्हाइट कॉलर क्राइम, ड्रग तस्करी तथा मनी लांड्रिग शामिल हैं। अपराध और आतंकवाद का यह संजाल मध्य-पूर्व, उत्तरी अफ्रीका, दक्षिण एशिया और दक्षिण एशिया में काफी जटिल एवं प्रभावशाली हैसियत को प्राप्त कर चुका है। इस समिश्र में न केवल आईएसआईएस, एक्यूआईएम, हिजबुल्ला, अल-शबाब या बोको हराम जैसे संगठन शामिल हैं बल्कि तालिबान, तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान सहित पाकिस्तान आधारित तमाम आतंकी व चरमपंथी संगठन भी शामिल हैं। खास बात यह है कि पाकिस्तान आधारित तमाम चरमपंथी संगठन ड्रग्स की बड़ी-बड़ी खेपें भारत में भेजने में कामयाब हो रहे हैं, जिससे उनका दोहरा मिशन पूरा हो रहा है। यानि एक आतंकी हमले के लिए फंडिंग प्राप्त करने का और दूसरी तरफ भारतीय युवाओं की जिंदगियां तबाह करने का जिसे हम डिवीडेंड के तौर पर देख रहे हैं। अफगानिस्तान और उसके साथ ही पाकिस्तान पूरी दुनिया में हेरोइन को उगाने और प्रॉसेस्ड करने के मामले में काफी आगे हैं। यहां से इसकी ट्रैफिकिंग अल-कायदा और तमाम सुन्नी चरमपंथी संगठनों के जरिए होती है। वर्ष 2011 की संयुक्त राष्ट्र ड्रग एवं अपराध कार्यालय ( यूएनओडीएसी) की एक रिपोर्ट के अनुसार अफगानिस्तान दुनिया का सबसे प्रमुख अफीम उत्पादक देश है जहां दुनिया की 93 प्रतिशत हेरोइन उत्पादक फसल होती है। विशेष बात यह है कि अफगानिस्तान में अफीम का उत्पादन दक्षिणी प्रांत में प्रमुख रूप से होता है जहां तालिबान सबसे मजबूत स्थिति में हैं। यानि तालिबान की मजबूती का आधार अफीम अर्थव्यवस्था ही है। रिपोर्ट के अनुसार इन आतंकियों व चरमपंथियों ने उस वर्ष 50 से 70 मिलियन डॉलर इससे प्राप्त किए। इस तरह से देखा जाए तो ड्रग ट्रेड मांग और पूर्ति के बीच में एक महत्वपूर्ण कड़ी है, जो वैश्विक अपराध उद्यम (क्राइम इंटरप्राइज) में सैकड़ों बिलियन डॉलर मूल्य का ईंधन भरने का कार्य करता है। गौर से देखें तो अफगानिस्तान, ईरान और पाकिस्तान इस मामले में एक 'गोल्डन ट्रैंगलÓ की तरह हैं क्योंकि इनकी सीमाओं के जनजातीय आबादी वाले क्षेत्र बड़ी मात्रा में अफीम और हीरोइन, बाल्कन के रास्ते से यूरोप और अमेरिका की ओर भेजकर खासी कमाई करते हैं। चीन का यून्नान प्रांत भी बड़े पैमाने पर उत्पादन करता है जिसे हांगकांग और ताइवान के रास्ते अतंरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाता है। उधर लेबनान की बेका घाटी में कैन्नाबीस तथा अफीम और लैटिनी अमेरिका में पेरू और कोलम्बिया में कोकीन का उत्पादन होता है। यानि ड्रग इकोनॉमिक वैश्विक अर्थव्यवस्था में समानांतर रूप से स्थापित हो रही है। दक्षिण एशिया के साथ-साथ भारत के लिए यह कारोबार एक बड़ी चुनौती है क्योंकि भारत में इसकी खासी घुसपैठ हो चुकी है। नार्कोटिक ब्यूरो का आकलन बताता है कि 1996 से 2006 के मध्य अन्य ड्रग्स के साथ-साथ 21,895 किग्रा अफीम, 8,55,667 किग्रा गांजा, 48,278 किग्रा हशीश और 10,147 किग्रा हेरोइन विभिन्न इनफोर्सिंग एजेंसियों के द्वारा जब्त की गई और इसमें 1,42,337 लोग सम्बद्ध पाए गये थे अब यह संख्या इससे काफी ज्यादा होगी। कुछ समय पहले सामाजिक न्याय और पर्यावरण मंत्रालय द्वारा कराए गये राष्ट्रीय सर्वेक्षण और संयुक्त राष्ट्र संघ के ड्रग और अपराध कार्यालय द्वारा कराए गये सर्वे के मुताबिक भारत के विभिन्न राज्यों में पर्याप्त मात्रा में ड्रग प्रयोगकर्ता पाए गये हैं। राजस्थान में इनका अनुपात सबसे ऊंचा (76.7 प्रतिशत) है, जिसके बाद हरियाणा (58.0 प्रतिशत) आता है। 43.9 प्रतिशत लोग उत्तर प्रदेश में और 37.3 प्रतिशत हिमाचल प्रदेश में हेरोइन के प्रयोगकर्ता लोग हैं। दिक्कत इस बात की है कि ड्रग कारोबार पर इस देश के कुछ प्रांतों की सरकारें और पुलिस या तो नरम हैं या फिर उनके कुछ मंत्री व अफसर इसमें सम्बद्ध हैं। यदि ऐसा न होता तो मुंबई बम ब्लास्ट के लिए आरडीएक्स नहीं आ पाता? पठानकोट हमले में भी यह शंका व्यक्त की जा रही है कि आतंकवादियों की घुसपैठ ड्रग माफियाओं द्वारा ही कराई गई। हालांकि अभी स्थिति पूरी तरह से स्पष्ट नहीं है लेकिन इससे इन्कार भी नहीं किया जा सकता है। सभी जानते हैं कि पंजाब इस समय ड्रग तस्करी का सबसे बड़ा अड्डा बना हुआ है और यह भी स्पष्ट है कि यह कारोबार भारत-पाकिस्तान सीमा से सम्पन्न होता है। इस संदर्भ में ऐसी तमाम रिपोर्टें हैं जो भारत को खतरे का एहसास करा रही हैं। लेकिन पंजाब सरकार और पंजाब पुलिस, इस मामले में या तो अक्रिय है या फिर जानबूझ कर ऐसा होने दे रही है। फिलहाल प्रत्येक आतंकी घटना को लेकर हम पाकिस्तान पर आंखे तरेरें या गरजें लेकिन अब समय आ गया है कि हमें स्वयं के अंदर भी झांकने की कोशिश करें कि आखिर इसका भारत की सीमा में प्रवेश कैसे सम्भव हो पा रहा है? भारत सरकार और खुफिया एजेंसियों को ड्रग कारोबार और आतंकवाद के लिए फंडिंग के बीच स्थापित सम्बंधों का यथार्थ भी जानना होगा। कारण यह है कि बारूद के बम से ड्रग बम कहीं ज्यादा खतरनाक साबित हो सकता है। डॉ. रहीस सिंह