शनिवार, 27 जून 2015

दबे पांव तानाशाही रास्ते पर

जून की 25 तारीख को आंतरिक आपातकाल लगाए जाने के प्रकरण के 40 साल पूरे हो गए।  यह आपातकाल 19 महीने चली थी। आपातकाल का लगाया जाना, स्वतंत्र भारत के इतिहास का एक बदनाम और काला अध्याय है। इंदिरा गांधी को, जो 1971 के लोकसभा चुनाव में जबर्दस्त बहुमत के साथ जीतीं थीं, बढ़ते जन-असंतोष का सामना करना पड़ रहा था। यह जन-असंतोष गुजरात के नव-निर्माण आंदोलन तथा जेपी आंदोलन जैसे विभिन्न जनांदोलनों के रूप में सामने आया था। इसी दौर में, 1974 के मई के महीने में 17 लाख रेल कर्मचारियों से जुड़ी रेल हड़ताल के रूप में, मजदूर वर्ग की भी सबसे बड़ी कार्रवाई सामने आई थी। इंदिरा गांधी की सरकार ने और सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी ने, जन-विरोध कार्रवाइयों तथा बढ़ते विरोध का मुकाबला दमन का सहारा लेकर करने की कोशिश की थी। इंदिरा सरकार का ‘प्रगतिशीलता का पाखंड’ पश्चिम बंगाल में सीपीआई (एम) तथा अन्य वामपंथी ताकतों के खिलाफ उसके अद्र्घ-फासी आतंक का सहारा लेने के चलते पहले ही बेनकाब हो चुका था। वास्तव में सबसे पहले सीपीआई (एम) ने ही, 1972 में हुई अपनी 9वीं कांग्रेेस से, एक  दलीय तानाशाहीपूर्ण शासन के खतरे की चेतावनी दी थी। आपातकाल लगाए जाने का तात्कालिक कारण तो इंदिरा गांधी की सरकार के विपक्ष की बढ़ती चुनौती में ही छुपा था, जिसका प्रतिनिधित्व जेपी आंदोलन करता था। इसके ऊपर से इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला आ गया, जिसने लोकसभा के लिए इंदिरा गांधी के चुनाव को अवैध घोषित कर दिया। इन हालात में खुद को घिरता महसूस कर इंदिरा गांधी ने जवाबी हमला करने का फैसला लिया और आपातकाल लगा दी। आपातकाल की घोषणा के बाद, विपक्षी पार्टियों के हजारों नेताओं व कार्यकर्ताओं को निवारक नजरबंदी के तहत पकडक़र जेलों में ठूंस दिया गया, नागरिक स्वतंत्रताओं को कुचला गया, प्रेस पर सेंसरशिप थोप दी गयी और सरकार की आलोचना का स्वर अपनाने वाली तमाम राजनीतिक गतिविधियों पर पाबंदी लगा दी गयी। मीसा के तहत सीपीआई (एम) के सैकड़ों नेताओं तथा कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया। बेशक, इस दमनकारी कदम के पीछे फौरी कारण तो अपने प्रधानमंत्री पद पर बने रहने के लिए इंदिरा गांधी द्वारा खतरा महसूस किए जाने में ही छुपा था। फिर भी उसे ही इकलौता कारण मानना भी गलत होगा। वास्तव में आपातकाल की घोषणा उस तानाशाहीपूर्ण मुहिम का चरमोत्कर्ष थी, जो पहले ही सामने आ चुकी थी। इस मुहिम की जड़ें राजनीतिक व्यवस्था तथा राजनीतिक अर्थव्यवस्था के संकट में और सत्ताधारी पार्टी के सामने आयी चुनौतियों में थीं। देश की राजनीति में एक ही पार्टी के बोलबाले के घटने के साथ, जो 1967 के आम चुनाव से साफ नकार आने लगा था, राजनीतिक अस्थिरता बढ़ रही थी। इन हालात में तानाशाही का सहारा लेना, सत्ताधारी वर्ग के लिए जरूरी हो गया था। इस सबने मिलकर पूंजीवादी जनतंत्र पर हमले की स्थिति रची थी। आपातकाल के जरिए इस गहराते संकट को हल करने की और एक कहीं ज्यादा तानाशाहीपूर्ण संवैधानिक व्यवस्था थोपने की कोशिश की जा रही थी। आपातकाल के दौरान संसद से जो 42वां संविधान संशोधन पारित कराया गया था, कार्यपालिका, न्यायपालिका तथा संसद के बीच के ताकतों के संतुलन को ही बदलने की कोशिश करता था। मिसाल के तौर पर इस संशोधन के जरिए संविधान में यह प्रावधान जोड़ा गया था कि न्याय पालिका, संसद द्वारा संविधान में किए गए किसी भी संशोधन की न्यायिक समीक्षा नहीं कर सकती है। बहरहाल, देश की राजनीतिक व्यवस्था में तानाशाहीपूर्ण विशेषताओं को जोडऩे की समूची कसरत विफल हो गयी क्योंकि जनता ने जनतंत्र पर हमले का साथ देने से इंकार कर दिया और आपातकाल को ठुकरा दिया। याद रहे कि आपातकाल मेें सिर्फ नागरिक स्वतंत्रताओं का अपहरण ही नहीं किया गया था, बल्कि अनिवार्य नसबंदी अभियान, बड़े पैमाने पर गरीबों के घरों के गिराए जाने और अन्य नौकरशाहाना मनमाने फैसलों के जरिए, जनता के खिलाफहमले भी किए जा रहे थे। वास्तव में इंदिरा गांधी ने चुनाव में जीतने की उम्मीद में ही, आपातकाल उठाने और 1977 के मार्च में चुनाव कराने का फैसला लिया था। बहरहाल, जब चुनाव हुए जनता ने उन्हें और उनकी कांग्रेस पार्टी को, धूल चटा दी। आपातकाल के 40 साल पूरे होने के मौके पर, इस मुद्दे पर बहस हो रही है कि क्या भारत में आपातकाल जैसे हालात दोबारा पैदा हो सकते हैं। लेकिन, यह सवाल को ही गलत तरह उठाना है। वास्तव में विचार इस सवाल पर किया जाना चाहिए कि क्या हमारे देश की राजनीतिक व्यवस्था के लिए, तानाशाही फिर से खतरा पैदा कर सकती है। संविधान के आपातकाल के प्रावधान का सहारा लेकर, फिर से तानाशाहीपूर्ण शासन थोपने की कोशिश किए जाने की संभावना बेशक बहुत कम है। लेकिन, इसकी संभावनाएं अपनी जगह मौजूद हैं कि दूसरे रूपों में तानाशाही का खतरा, देश की जनतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरा पैदा कर दे।      अगर चार दशक पहले आपातकाल लगाए जाने के पीछे राजनीतिक व्यवस्था का संकट, स्थिरता की समस्या तथा आर्थिक हालात पर बढ़ते जन-असंतोष जैसे बुनियादी कारण काम कर रहे थे, आज भी तानाशाही के उभार के लिए जिम्मेदार उक्त सभी कारक, परिपक्व अवस्था में दिखाई दे रहे हैं। नवउदारवाद के कुपरिणाम, हिंदुत्ववादी सांप्रदायिक ताकतों का उभार, राजनीतिक पार्र्टियों में गिरावट तथा राज्य की संस्थाओं के खोखले होने, सब ने मिलकर धीरे-धीरे तानाशाही के बढऩे के हालात पैदा कर दिए हैं। यहां यह याद दिलाना उपयोगी होगा कि सीपीआई (एम) की 10वीं कांग्रेस ने, जो 1978 के अप्रैल में जालंधर में हुई थी, यह चेतावनी दी थी कि तानाशाही का खतरा तब तक बना रहेगा जब तक अर्थव्यवस्था पर तथा राजनीतिक व्यवस्था पर बड़े पूंजीपति वर्ग तथा भूस्वामियों का वर्चस्व बना हुआ है और इस या उस राजनीतिक गठजोड़ द्वारा अपने शासन को टिकाऊ बनाने के लिए तानाशाही कायम करने की कोशिशें की जाती रहेंगी। नवउदारवादी व्यवस्था में सिर्फ उत्पादन के ही नहीं, बल्कि शिक्षा व स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सेवाओं के भी बड़े हिस्से बाजार की ताकतों तथा बड़ी पूंजी के हवाले कर दिए गए हैं। इसका नतीजा यह हुआ है कि असमानता तथा भ्रष्टïाचार ने अभूतपूर्व ऊंचाइयों को छू लिया है और यह नागरिकों के बुनियादी अधिकारों को तथा जनतंत्र को ही खोखला कर रहा है। नवउदारवाद, बाजार को जनता तथा उसके अधिकारों के ऊपर रखने के जरिए, जनतंत्र को सीमित कर रहा है तथा सिकोड़ रहा है। बड़ी पूंजी राजनीतिक व्यवस्था में घुस गई है और तमाम पूंजीवादी राजनीतिक पार्टियां बड़े पैसे की ताकत की गुलाम हो गई हैं। यही है जो जनतांत्रिक व्यवस्था को खोखला कर रहा है। सत्ताधारी भाजपा, राष्ट्रीय  स्वयंसेवक संघ द्वारा संचालित तथा नियंत्रित है। इससे शासन की संस्थाओं में आरएसएस का एजेंडा तथा उसके लोगों के घुसाए जाने का रास्ता खुल गया है। इस तरह, अद्र्घ-फासीवादी विचारधारा तथा लक्ष्योंवाले इस संगठन को, जिसकी विचारधारा तथा लक्ष्य भारतीय संविधान में घोषित धर्मनिरपेक्ष, जनतांत्रिक सिद्घांतों के ही खिलाफ पड़ते हैं, इसका मौका मिल गया है कि संविधान को भीतर से खोखला करें। हिंदुत्ववादी संगठन, शासन का सहारा लेकर मनमर्जी कर रहे हैं और धार्मिक अल्पसंख्यकों पर अपने मूल्य थोपने और उनके बुनियादी अधिकारों का अतिक्रमण करने में लगे हुए हैं। इस तरह, तानाशाही बढ़ते पैमाने पर सामाजिक तथा सांस्कृतिक क्षेत्रों में प्रवेश कर रही है। नवउदारवादी बाजारवादी तत्ववाद और हिंदुत्व का मिश्रण, तानाशाही का खतरनाक नुस्खा है। एक ओर सरकार श्रम कानूनों में बदलावों के जरिए ट्रेड यूनियनों को कमजोर करने के लिए कदम उठा रही है और दूसरी ओर संसद को बरतरफ कर, अध्यादेशों के जरिए बाजार-अनुकूल कानून बनाने की कोशिश कर रही है, जिसका उदाहरण भूमि अधिग्रहण कानून में किए गए बदलाव हैं। अगर इंदिरा गांधी का निजाम एक ‘‘वफादार नौकरशाही’’ की कल्पना करता था, आज शासन के इस औजार को नवउदारवादी बाजारवादी मूल्यों की घुसपैठ ने और भी कमजोर कर दिया है। इन मूल्यों ने बड़े पैमाने के भ्रष्टïाचार को और बड़े कारोबारी-सत्ताधारी राजनीतिज्ञ-नौकरशाह गठजोड़ की ओर से अवैध तथा स्वार्थपूर्ण करतूतों को अंजाम देने की इच्छा को हर तरफ फैला दिया है। न्यायपालिका को आपातकाल में झुका लिया गया था और उसके बाद से उसकी स्वतंत्रता का एक हद तक बहाल भी किया जा सका है। लेकिन, न्यायपालिका की भी स्वतंत्रता तथा ईमानदारी का क्षरण हुआ है। उधर यूएपीए, अफस्पा जैसे दमनकारी कानूनों तथा भारतीय दंड संहिता में राजद्रोह से संबंधित धाराओं की मौजूदगी और इन सब का बार-बार सहारा लिए जाने ने, नागरिकों के मौलिक अधिकारों को कमजोर कर दिया है। हमने देखा है कि किस तरह सत्ताधारी वर्ग की पार्टियां समय-समय पर राजनीतिक व्यवस्था में ही बदलाव कर, शासन की स्थिरता सुनिश्चित करने की कोशिशें करती आई हैं। मिसाल के तौैर पर, हाल में आपातकाल के दोबारा आ सकने की चेतावनी देने वाले लालकृष्ण आडवानी ही, पिछली एनडीए सरकार के राज में राष्टï्रपति प्रणाली की सरकार लाने के लिए जोर लगा रहे थे। वास्तव में भारत में सत्ताधारी वर्ग के अनेक हिस्से तो यह चाहते ही हैं कि देश में कहीं ताकतवर, कार्यपालिका प्रमुख के रूप में राष्टï्रपति प्रणाली कायम की जाए। उन्हें ऐसा परिवर्तन, हमारे देश की कमजोर तथा निष्प्रभ राजनीतिक व्यवस्था को, तानाशाही एक खुराक दे सकता है। लोकसभा में बहुमत हासिल होने के बाद से मोदी सरकार ने बढ़ते पैमाने पर संसद के प्रति हिकारत का ही प्रदर्शन किया है। अध्यादेशों की बाढ़, राज्यसभा को तुच्छ साबित करने की कोशिशें और सारी शक्तियों का प्रधानमंत्री के हाथों में ही केंद्रित कर दिया जाना, सभी नवउदारवाद के तहत जारी इसकी प्रक्रिया के ही हिस्से हैं कि जनतंंत्र को सिकोड़ा जाए और महत्वपूर्ण निर्णय शक्तियों व नीतियों को निर्वाचित निकायों के हाथों से ही छीन लिया जाए। इस तरह आज हमारा सामना तानाशाहीपूर्ण व्यवस्था की ओर रेंगकर बढ़े जाने से है। नवउदारवाद, हिंदुत्ववादी सांप्रदायिकता और तानाशाही के खिलाफ बहुमुखी संघर्ष की जरूरत है। ये तीनों बुनियादी तरीके से आपस में जुड़े हुए हैं। चार दशक पहले लगाए गए आपातकाल से सही सबक लेना, इस वर्तमान संघर्ष में हमारी मदद करेगा।
प्रकाश करात 
(साभार-देशबंधु)

कैच मी इफ़ यू कैन: सुब्रमण्यम स्वामी

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    जयप्रकाश नारायण के साथ सुब्रमण्यम स्वामी
  • 25 जून, 1975 को रामलीला मैदान में जेपी की ऐतिहासिक सभा से लौटने के बाद सुब्रमण्यम स्वामी गहरी नींद में थे कि अचानक चार बजे सुबह उनके फ़ोन की घंटी बजी. दूसरे छोर पर ग्रेटर कैलाश पुलिस स्टेशन का एक सब इंस्पेक्टर था.
    उसने कहा, "क्या आप घर पर हैं? क्या मैं आपसे मिलने आ सकता हूँ?" स्वामी ने उसे आने के लिए हाँ कर दिया.
    लेकिन उनका माथा ठनका कि पुलिस किसी के यहाँ जाने से पहले ये नहीं बताती कि वो उससे मिलने आ रही है. ज़ाहिर था कोई उन्हें टिप ऑफ़ कर रहा था कि समय रहते आप अपने घर से निकल कर ग़ायब हो जाइए.
    स्वामी ने वही किया. तड़के साढ़े चार बजे वो गोल मार्केट में रह रहे अपने दोस्त सुमन आनंद के घर चले गए.
                    जयप्रकाश नारायण के साथ सुब्रमण्यम स्वामी.
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    सुब्रमण्यम स्वामी, जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, नानाजी देशमुख, राजनारायण
    सिख का वेश बनाया
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    सिख के वेश में सुब्रमण्यम स्वामी.
    लंदन में बीके नेहरू से मुलाक़ात
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    बीबीसी स्टूडियो में रेहान फ़ज़ल के साथ सुब्रमण्यम स्वामी.
    किसिंजर से सिफ़ारिश
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    अमरीकी राष्ट्रपति गेरॉल्ड फोर्ड के साथ विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर
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    हारवर्ड यूनिवर्सिटी में गणित की क्लास लेते सुब्रमण्यम स्वामी.
    पुलिस का क़हर
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    बीबीसी स्टूडियो में रेहान फ़ज़ल के साथ सुब्रमण्यम स्वामी की पत्नी रौक्शना स्वामी.
    टिकट बैंकॉक का, उतरे दिल्ली में
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    रौक्शना स्वामी के साथ सुब्रमण्यम स्वामी
    'प्वाएंट ऑफ ऑर्डर'
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    मोरारजी देसाई के साथ सुब्रमण्यम स्वामी
    'बुक पब्लिश्ड'
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    राजघाट पर एकजुटता की शपथ लेते जनता पार्टी के नेता.
    नेपाल के महाराजा ने की मदद
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    नेपाल के महाराजा वीरेंद्र.
    शानदार घर वापसी
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    इंदिरा गांधी से क्रिकेट ट्रॉफी लेते सुब्रमण्यम स्वामी.

    पुलिस ने स्वामी को हर जगह ढूंढ़ा, लेकिन वो उसके हाथ नहीं आये. एक दिन जहाँ वो रह रहे थे, दरवाज़े की घंटी बजी.
    उनके दोस्त ने बताया कि आरएसएस के कोई साहब आपसे मिलने आए हैं.
    उन्होंने स्वामी को संदेश दिया कि अंडरग्राउंड चल रहे जनसंघ के बड़े नेता नानाजी देशमुख उनसे मिलना चाहते हैं.
    वो उसी आरएसएस कार्यकर्ता के स्कूटर पर बैठकर राजेंद्र नगर के एक घर पहुंचे जहाँ नानाजी देशमुख उनका इंतज़ार कर रहे थे.
    नानाजी ने उनसे मज़ाक किया, "डॉक्टर क्या अब तुम अमरीका भाग जाना नहीं चाहते?"
    डॉक्टर स्वामी भारत आने से पहले हॉर्वर्ड विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफ़ेसर हुआ करते थे और उन्होंने नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री पॉल सैमुअलसन के साथ एक शोध पत्र पर काम किया था.
    इसके बाद स्वामी और नानाजी अक्सर मिलने लगे. इस बीच स्वामी ने पगड़ी और कड़ा पहन कर एक सिख का वेश धारण कर लिया ताकि पुलिस उन्हें पहचान न सके. उनका अधिकतर समय गुजरात और तमिलनाडु में बीता, क्योंकि वहाँ कांग्रेस का शासन नहीं था.
    गुजरात में स्वामी वहाँ के मंत्री मकरंद देसाई के घर रुका करते थे. उन दिनों आरएसएस की तरफ़ से एक व्यक्ति उन्हें देसाई के घर छोड़ने आया करता था. उस शख़्स का नाम था नरेंद्र मोदी, जो चार दशक बाद भारत के प्रधानमंत्री बने.
    इस बीच आरएसएस ने ये तय किया कि स्वामी को आपातकाल के ख़िलाफ़ प्रचार करने के लिए विदेश भेजा जाए. अमरीका और ब्रिटेन में स्वामी के बहुत संपर्क थे, क्योंकि वो पहले वहाँ रह चुके थे.
    स्वामी ने मद्रास से कोलंबो की फ़्लाइट पकड़ी और फिर वहाँ से दूसरा जहाज़ पकड़कर लंदन पहुंचे. लंदन में स्वामी के पास ब्रिटेन में उस समय भारत के उच्चायुक्त बीके नेहरू का फ़ोन आया.
    उन्होंने स्वामी को मिलने अपने दफ़्तर बुलाया. स्वामी वहाँ जाने में झिझक रहे थे क्योंकि उन्हें डर था कि नेहरू उन्हें गिरफ़्तार करवा देंगे. बहरहाल उनकी नेहरू से मुलाकात हुई और उन्होंने सलाह दी कि वो भारत वापस जाकर आत्मसमर्पण कर दें.
    दो दिन बाद ही स्वामी के पास फ़ोन आया कि उनका पासपोर्ट रद्द कर दिया गया है. जब स्वामी अमरीका पहुंचे तो भारतीय अधिकारियों ने अमरीका पर दबाव बनाया कि स्वामी को उन्हें सौंप दिया जाए क्योंकि वो भारत से भागे हुए हैं और उनका पासपोर्ट रद्द किया जा चुका है.
    लेकिन इस बीच स्वामी के हार्वर्ड के कुछ प्रोफ़ेसर दोस्त अमरीका के विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर से उनकी सिफ़ारिश कर चुके थे.
    अमरीका ने भारतीय अधिकारियों से कहा कि भारत ये दावा ज़रूर कर रहा है कि स्वामी का पोसपोर्ट रद्द कर दिया गया है. लेकिन उनके पासपोर्ट पर इसकी मोहर कहीं नहीं लगी है और अमरीकी सरकार भारत के लिए पुलिस की भूमिका नहीं निभा सकती.
    स्वामी अमरीका में कई महीनों तक रहे और वहाँ के 24 राज्यों में जाकर उन्होंने आपातकाल के ख़िलाफ़ प्रचार किया.
    इस बीच प्रवर्तन निदेशालय के लोगों ने स्वामी के दिल्ली के ग्रेटर कैलाश स्थित निवास और उनके ससुर जमशेद कापड़िया के मुंबई के नेपियन सी रोड वाले मकान पर दबिश दी.
    रिटायर्ड आईसीएस ऑफ़िसर कापड़िया के लिए ये बहुत बड़ा धक्का था कि छोटे मोटे अफ़सर न सिर्फ़ उनसे अनाप-शनाप सवाल पूछकर उन्हें तंग कर रहे थे बल्कि बहुत बेअदबी से भी पेश आ रहे थे.
    स्वामी की पत्नी रौक्शना बताती हैं कि उनके घर की एक-एक चीज़ ज़ब्त कर ली गई. कार, एयरकंडीशनर, फर्नीचर सभी पुलिस ले गई. वो मकान पर भी ताला लगाना चाहते थे, लेकिन घर रौक्शना के नाम था.
    उनके दोस्त अहबाबों ने उनसे मिलना छोड़ दिया. जो भी उनसे मिलने आता, उसके घर रेड हो जाती और जिनसे ये लोग मिलने जाते, उनके पीछे भी पुलिस वाले लग जाते.
    इस बीच स्वामी के मन में आ रहा था कि वो ऐसा कुछ करें जिससे पूरे देश में तहलका मच जाए. संसद का कानून है कि अगर कोई सांसद बिना अनुमति के लगातार 60 दिनों तक अनुपस्थित रहता है तो उसकी सदस्यता अपने आप निरस्त हो जाती है.
    स्वामी ने तय किया कि वो भारत वापस लौटेंगे और राज्यसभा की उपस्थिति रजिस्टर पर दस्तख़त करेंगे. उन्होंने पैन-एम की फ़्लाइट से लंदन-बैंकॉक का हॉपिंग टिकट ख़रीदा. चूंकि वो बैंकॉक जा रहे थे, इसलिए दिल्ली उतरने वाले लोगों की सूची में उनका नाम नहीं था.
    फ़्लाइट सुबह तीन बजे दिल्ली पहुंची. स्वामी के पास एक बैग के सिवा कोई सामान नहीं था. उस ज़माने में हवाई अड्डों पर इतनी कड़ी सुरक्षा नहीं होती थी.
    उन्होंने ऊंघते हुए सुरक्षा गार्ड को अपना राज्यसभा का परिचय पत्र फ़्लैश किया. उसने उन्हें सेल्यूट किया और वो बाहर आ गए. वहाँ से उन्होंने टैक्सी पकड़ी और सीधे राजदूत होटल पहुंचे.
    वहाँ से उन्होंने अपनी पत्नी को एक अंग्रेज़ की आवाज़ बनाते हुए फ़ोन किया कि आपकी मौसी ने इंग्लैंड से आपके लिए एक तोहफ़ा भेजा है. इसलिए उसे लेने के लिए एक बड़ा बैग ले कर आइए. पहले से तय इस कोड का मतलब था कि वो उनके लिए सरदार की एक पगड़ी, नकली दाढ़ी और एक शर्ट पैंट लेकर पहुंच जाएं.
    उनकी पत्नी रौक्शना ने ऐसा ही किया. उन्होंने अपनी पत्नी से कहा कि वो शाम को एक टेलीविज़न मकैनिक का वेश बना कर घर पर आएंगे. शाम को स्वामी ने अपने ही घर का दरवाज़ा खटखटा कर कहा कि मैं आपका टेलीविज़न ठीक करने आया हूँ.
    वो अपने घर में घुसे और फिर पांच दिनों तक वहाँ से बाहर ही नहीं निकले. बाहर तैनात पुलिस को पता ही नहीं चला कि स्वामी अपने घर पहुंच चुके हैं.
    इस बीच रौक्शना ये पता लगाने कई बार संसद भवन गईं कि मुख्य भवन से बाहरी गेट तक आने में कितने कदम और कितना समय लगता है. 10 अगस्त, 1976 को रौक्शना ने स्वामी को अपनी फ़िएट कार से संसद के गेट नंबर चार पर छोड़ा और चर्च ऑफ़ रेडेंप्शन के पास अपनी गाड़ी पार्क की.
    स्वामी बिना किसा रोकटोक के संसद में घुसे. उपस्थिति रजिस्टर पर दस्तख़त किए. तभी कम्युनिस्ट सांसद इंद्रजीत गुप्त उनसे टकरा गए. उन्होंने पूछा तुम यहाँ क्या कर रहे हो?
    स्वामी ज़ोर से हंसे और उनका हाथ पकड़े हुए राज्यसभा में घुसे. इससे पहले रौक्शना ने आस्ट्रेलिया ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन के संवाददाता को पहले से बता दिया था कि वो संसद में एक दिलचस्प घटना देखने के लिए मौजूद रहें.
    स्वामी की टाइमिंग परफ़ेक्ट थी. उस समय राज्यसभा में दिवंगत हुए सांसदों के शोक प्रस्ताव पढ़े जा रहे थे. जैसे ही सभापति बासप्पा दानप्पा जत्ती ने अंतिम शोक प्रस्ताव पढ़ा, स्वामी तमक कर उठ खड़े हुए.
    उन्होंने चिल्लाकर कहा, "प्वाएंट ऑफ़ ऑर्डर सर.... आपने दिवंगत लोगों में भारत के जनतंत्र को शामिल नहीं किया है.." पूरे कक्ष में सन्नाटा छा गया.
    गृहराज्य मंत्री घबरा कर मेज़ के नीचे छिपने की कोशिश करने लगे. उन्हें डर था कि स्वामी के हाथ में बम तो नहीं है.
    हतप्रभ जत्ती ने स्वामी को गिरफ़्तार करने का आदेश देने की बजाए सांसदों को दिवंगत सांसदों के सम्मान में खड़े होकर दो मिनट का मौन रखने के लिए कहा.
    इस अफ़रातफ़री का फ़ायदा उठाते हुए स्वामी चिल्लाए कि वो वॉक आउट कर रहे हैं. वो तेज़ कदमों से संसद भवन के बाहर आए और चर्च के पास पहुंचे जहाँ रौक्शना ने पहले से कार पार्क कर चाबी कार्पेट के नीचे रख दी थी.
    वहाँ से वो कार चलाकर बिरला मंदिर गए, जहां उन्होंने कपड़े बदलकर सफेद कमीज़-पैंट पहनी और अपने सिर पर गांधी टोपी लगाई. बिरला मंदिर से वो ऑटो से स्टेशन पहुंचे और आगरा जाने वाली गाड़ी में बैठ गए.
    वो मथुरा में ही उतर गए और नज़दीक के टेलीग्राफ़ ऑफ़िस से उन्होंने रौक्शना को तार भेजा, 'बुक पब्लिश्ड.' यह पहले से तय कोड था जिसका अर्थ था कि वो सुरक्षित दिल्ली से बाहर निकल गए हैं.
    मथुरा से उन्होंने जीटी एक्सप्रेस पकड़ी और नागपुर उतरकर गीतांजलि एक्सप्रेस से मुंबई के लिए रवाना हो गए. तब मुंबई में वो आजकल मोदी मंत्रिमंडल में मंत्री पीयूष गोयल के पिता प्रकाश गोयल के यहाँ ठहरे थे.
    कुछ दिन भूमिगत रहने के बाद स्वामी ने आरएसएस नेता भाऊराव देवरस के ज़रिए नेपाल के प्रधानमंत्री तुलसी गिरि से संपर्क किया. उन्होंने उनसे कहा कि वो नेपाल के महाराजा वीरेंद्र से मिलना चाहते हैं, जोकि हार्वर्ड के विद्यार्थी रह चुके थे.
    तुलसी गिरि ने उन्हें बताया कि वो रॉयल नेपाल एयरलाइंस के ज़रिए, उन्हें काठमांडू नहीं ला सकते, क्योंकि अगर इंदिरा गाँधी को इसके बारे में पता चल गया तो वो नाराज़ हो जाएंगी.
    महाराज वीरेंद्र ने उन्हें गिरि के ज़रिए संदेश भिजवाया कि अगर स्वामी किसी तरह नेपाल पहुंच जाएं तो उन्हें अमरीका भिजवाने की ज़िम्मेदारी उनकी होगी.
    स्वामी गोरखपुर के रास्ते काठमांडू पहुंचे, जहाँ तुलसी गिरि ने उन्हें रॉयल नेपाल एयरलाइंस के विमान के ज़रिए बैंकॉक भेजने की व्यवस्था कराई. बैंकॉक से स्वामी ने अमरीका के लिए दूसरी फ़्लाइट पकड़ी.
    दो महीने बाद इंदिरा गांधी ने चुनाव की घोषणा कर दी. स्वामी ने दोबारा भारत आने का फ़ैसला किया, हालांकि उनके खिलाफ़ गिरफ्तारी का वारंट बरकरार था और करीब एक दर्जन मामलों में उनका नाम था.
    जब वो मुंबई के साँताक्रूज़ हवाई अड्डे पर पहुंचे तो पुलिस नें उन्हें हवाई अड्डे से बाहर नहीं आने दिया. आधे घंटे बाद दिल्ली से संदेश गया कि स्वामी के गिरफ्तार नहीं किया जाए. दो दिन बाद स्वामी राजधानी एक्सप्रेस से दिल्ली लौटे. प्लेटफॉर्म पर हज़ारों लोग उनके स्वागत में मौजूद थे. नारे लगाती भीड़ ने उन्हें ज़मीन पर पैर नहीं रखने दिया.
    वो लोगों के कंधों पर बैठकर स्टेशन से बाहर आए. उनकी दो साल की बेटी और आजकल हिंदू अखबार की विदेशी मामलों की संवाददाता सुहासिनी हैदर ज़ोर-ज़ोर से रो रही थीं, क्योंकि उस शोर-शराबे के दौरान उनकी रबर की चप्पल कहीं खो गई थी.
    स्वामी ने वर्ष 1977 में मुंबई से लोकसभा का चुनाव लड़ा और भारी मतों से जीत कर सदन में पहुंचे.
  •    रेहान फजल 
  • (साभार-बी बी सी)

गुरुवार, 25 जून 2015

श्रीमती गांधी और आपातकाल

चालीस साल काफी लम्बा समय मालूम देता है। लेकिन इतना लम्बा भी नहीं है कि उस जंगल-राज की याद भुला दें जो 1975 में आपातकाल लगने के बाद शुरु हो गया था। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया  गांधी की सास इंदिरा गांधी को इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस निर्णय के बाद पद से हट जाना चाहिए था, जिसमें चुनाव में सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल करने के लिए उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट के अवकाशकालीन न्यायाधीश ने हाईकोर्ट के निर्णय पर रोक लगाकर उन्हें राहत दी थी। फिर भी वह अंतिम नतीजे के बारे में निश्चिंत नहीं थीं। बताया जाता है कि कोर्ट के निर्णय के बाद एक समय उन्होंने अंतिम फैसला आने तक पद से हटने और जगजीवन राम या उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलापति त्रिपाठी को प्रधानमंत्री बनाने की बात सोची थी। लेकिन उनके बेटे संजय गंाधी जो बाद में संविधान से बाहर की ताकत बन गए थे और जिन्होंने सरकार चलाई, अपनी मां की कमजोरी जानते थे। उन्होंने हरियाणा के तत्कालीन मुख्यमंत्री बंसीलाल की मदद से भाड़े पर भीड़ जमा की और श्रीमती गंाधी के समर्थक के रूप में प्रधानमंत्री निवास के सामने परेड करा दी। इसके बाद श्रीमती गांधी ने सच में यह मान लिया कि जनता उन्हें चाहती है और सिर्फ राजनीति के कुछ असंतुष्ट तत्व ही उनके विरोध में हैं। इसके बाद वह पूरी तरह संजय पर निर्भर हो गईं। उनके घर के सूत्र बताते हैं कि वह संजय से ही राजनीति की बातें करती थीं और राजीव गंाधी को नजरअंदाज करती थीं, क्योंकि वह उन्हें अराजनीतिक समझती थीं। यह भी उतना ही सच है कि राजीव राजनीति में बहुत कम रुचि लेते थे और हवाई जहाज उड़ाने में काफी माहिर थे। वह इंडियन एयर लाईंस में एक बढिय़ा पायलट माने जाते थे जो देश के भीतर हवाई यात्रा के लिए एकमात्र एयरलाईंस थी। यह अलग बात है कि श्रीमती गंाधी ने उन पर राजनीति थोप दी और उन्होंने देश पर अपना प्रधानमंत्रित्व थोप दिया। यह आश्चर्य की बात लगे, लेकिन प्रतिरोध संकीर्णतावादी ताकतों -जनसंघ जो आज भाजपा है और अकाली दल जिसमें सिक्ख थे- ने किया। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी समेत सेकुलर ताकतों ने बिना किसी एतराज के श्रीमती गंाधी के तानाशाही वाले शासन को स्वीकार किया। माक्र्सवादी नाखुश थे, लेकिन सामने नहीं आए। प्रेस की भूमिका अत्यंत दयनीय थी। (उस समय कोई इलेक्ट्रॉनिक मीडिया नहीं था) यह बहादुुरी और नैतिकता के उपदेश देता था, लेकिन बहुत कम लोगों और अखबारों ने विरोध किया। श्रीमती गांधी का यह कहना कि एक भी कुत्ता नहीं भौंका, अपने अर्थ और लहजे में सही था। फिर भी, यह वास्तविकता है कि प्रेस एकदम ढह गया था। श्रीमती गंाधी की टिप्पणी से चिढक़र, मैंने 103 पत्रकारों (आज भी उनकी सूची मेरे पास है) को प्रेस क्लब में जमा किया। खुद ही अखबारों और न्यूज एजेंसियों में गया था। जमा होने वालों में टाइम्स ऑफ इंडिया के स्थानीय संपादक गिरिलाल जैन शामिल थे। मैंने आपातकाल और सेंसरशिप लगाने की निंदा के लिए तैयार किया हुआ अपना प्रस्ताव पढ़ा। एक पत्रकार ने जानकारी दी कि कुछ संपादकों को हिरासत में लिया गया है। मैंने उपस्थित पत्रकारों से प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करने के लिए कहा। मैंने बताया कि इसे राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और सूचना मंत्री को अपने हस्ताक्षर से भेजूंगा। प्रेस क्लब छोडऩे के पहले मैंने प्रस्ताव की कापी अपने पास रख ली थी कि यह पुलिस के हाथों न पड़ जाए। मैं अपने घर पहुंचा ही था कि सूचना मंत्री विद्याचरण शुक्ला, जो उस समय तक एक मित्र थे, का फोन आया और उन्होंने पूछा कि क्या मैं उनके कार्यालय आ सकता हूं। मैं एक दूसरे ही शुक्ला को देखकर दंग रह गया जिनकी आवाज में रौब था और जिनका अंदाज धमकाने वाला था। उन्होंने मुझसे वह कागज देने के लिए कहा, जिस पर पत्रकारों ने हस्ताक्षर किए थे। जब मैंने ‘‘ना’’ कहा तो उन्होंने चेतावनी दी कि मुझे गिरफ्तार किया जा सकता है। ‘‘तुम्हें समझना चाहिए कि यह अलग सरकार है, जिसे इंदिरा गंाधी नहीं, संजय गंाधी चला रहे हैं,’’ उन्होंने कहा। फिर भी मैंने पत्र को श्रीमती गांधी तक पहुंचाया, जिसमें कहा गया था: मैडम, एक अखबार वाले के लिए यह तय करना सदैव मुश्किल होता है कि उसे कब कौन सी जानकारी बाहर लानी चाहिए...एक मुक्त समाज में -और आपने आपातकाल के बाद बार-बार कहा है कि ऐसे विचार में आपकी आस्था है- प्रेस का कर्तव्य है कि वह जनता को सूचित करे। यह कई बार अप्रिय काम होता है, फिर भी उसे करना होता है क्योंकि मुक्त समाज मुक्त सूचना पर आधारित होता है। अगर प्रेस को सिर्फ  सरकारी पर्चे और सरकारी बयान छापने हों, आज जैसी स्थिति में यह आ गया है, तो गड़बड़ी, खामियों और गल्तियों की ओर कौन ध्यान दिलाएगा?’’ लेकिन तीन महीने की हिरासत काटने के बाद मैंने जेल से बाहर आकर धागा जोडऩे की कोशिश की, तो यह देखकर आश्चर्य हुआ कि पत्रकार मुझे खुले रूप से समर्थन करने में डरते थे। तात्कालीन जनसंघ के नेता एलके आडवानी ने एकदम सही टिप्पणी की: आप (पत्रकारों) को झुकने के लिए कहा गया था, लेकिन आप तो रेंगने लगे।’’ अगर मुझे आज की पीढ़ी को आपातकाल के बारे में समझाना हो तो मैं इस कहावत को दोहराना चाहूंगा कि प्रेस की आकाादी की रक्षा के लिए लगातार सजग रहने की जरूरत है। यह बात आज भी उतनी ही सच है जितनी आकाादी पाने के समय 70 साल पहले थी। किसी ने यह उम्मीद नहीं की थी कि हाईकोर्ट के दोषी ठहराए जाने के बाद प्रधानमंत्री संविधान को ही स्थगित कर देंगी जबकि उन्हें खुद ही पद छोड़ देना चाहिए था। पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री अपने मित्रों को सलाह दिया करते थे कि ढीला होकर बैठिए, चुस्त होकर नहीं।’’ यही वजह है कि तमिलनाडु के अरियालुर में एक बड़ी दुर्घटना के बाद उन्होंने रेलमंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया था। उन्होंने दुर्घटना की नैतिक जिम्मेदारी ली थी। यह कल्पना करना कठिन है कि आज कोई इस मिसाल पर चलेगा। लेकिन भारत आज भी एक ऐसा मुल्क समझा जाता है जहां नैतिकता मौजूद है, संकीर्णतावाद और शान-शौकत से रहना कोई जवाब नहीं है। देश को महात्मा गांधी के कहे इस कथन की ओर लौटना होगा: ‘‘विषमता लोगों को कुछ भी करने की ओर धकेल देती है।’’ स्वतंत्रता आंदोलन के दिनों को याद करने की जरूरत है। अंग्रेजों को बाहर करने के लिए सभी एकजुट हो गए थे। गरीबी दूर करने के लिए इसी भावना को फिर से याद करने की जरूरत है। नहीं तो, आकाादी का अर्थ सिर्फ  यही रह जाएगा कि धनी लोगों का जीवन बेहतर हो।
कुलदीप नैय्यर
(साभार देशबंधु)

सोमवार, 22 जून 2015

खुश रहने के तरीके

अक्सर हम लोग अपनी तरफ से पूरी मेहनत कर रहे होते हैं, लेकिन नतीजे हमेशा अपनी पसंद के हिसाब से मिलते. कभी पैसे कम मिल रहे होते हैं तो कभी पैसों के चक्कर में अपनी पसंद का काम छोड़कर कुछ ऐसा करना पड़ता है जो ज़रा कम पसंद हो. कभी ऐसा भी होता है जब पैसे और पसंद दोनों मिल रहे होते हैं लेकिन घर / परिवार / दोस्तों से दूर रहकर काम करना पड़ता है. ऐसे में सक्सेसफुल होने या कहलाने के बाद भी दिल भीतर से खुश नहीं रहता. ऐसे में शायद हम लोग कुछ छोटी-छोटी चीज़ें भूल रहे होते हैं जिनकी ओर ध्यान देने पर अपने मन को दिलासा दे सकते हैं, खुश रह सकते हैं.

खुश रहने के तरीके हमें बचपन से ही पता होते हैं, सिर्फ बाद में जीवन की आपाधापी में हम इन्हें भूल जाते हैं. अपने बचपन के दिनों को याद कीजिए, थोड़ा सा बच्चों वाली हरकतें करके देखियेः-  

1. मुस्कुराइए ज्यादाऔर शिकायतें कम कीजिये. हर समय तुनकने और शिकायतें करते रहनेवाले व्यक्ति को कौन पसंद करेगा? बच्चों से कुछ सीखिए. बच्चे दिन भर हँसते हैं, 400 बार लगभग, और शायद एक दो बार किसी चीज़ की शिकायत करते हैं!   

2. नए लोगों और पुराने दोस्तों से मिलते रहिये. अपना फोन उठाइए और देखिए कि आपने अपने किन दोस्तों और रिश्तेदारों से बहुत समय से बात नहीं की है. उन्हें फोन लगाकर सरप्राइज़ दीजिए, आप दोनों ही बात करके बहुत अच्छा फ़ील करेंगे. पड़ोस में कोई नया शिफ्ट किया हो तो खुद से आगे बढ़कर उनका परिचय लीजिए, हो सकता है वे संकोच के कारण आप. नए लोग   

3. अपने परिवार को थोड़ा अधिक समय दीजिये. पुराने दिनों में आप स्कूल से घर लोटते ही सबको पूरे दिन के किस्से सुनाने लगते थे न? उसी तरह शाम की चाय के दौरान या डिनर से समय उनसे बातें कीजिए. उनसे पूछिए कि उनका दिन कैसा बीता.   

4. जरुरत पड़ने पर दूसरों की यथासंभव मदद कीजिये. किसी को कोई मामूली चीज़ जैसे ‘पेंसिल’ या ‘रबर’ नहीं मिल रही हो तो अपनी देने में कोई नुकसान नहीं है. बहुत संभव है कि वे आपसी छोटी सी मदद को भी याद रखेंगे. वे पेपरवर्क या कंप्यूटर में कहीं अटक रहे हों तो उन्हें ज़रूरी सुझाव दें. यदि आर्थिक रूप से मदद करने का मामला हो तो उतनी ही रकम दें जितने का घाटा आप सहन कर सकते हों, हालांकि यह ज़रूरी नहीं कि सामनेवाला आपका उधार चुकता न ही करे.   5. आशावादी बनिए, सब अच्छा ही होगा ये मान के चलिए. मम्मी के डांटने पर बच्चे शाम को घर लौटने पर पापा से शिकायत करते हैं न! यह मत सोचिए कि जिस चीज को बुरा होना है वह बुरा होकर रहेगी. हमेशा याद रखिए कि सब कुछ खत्म हो जाने पर भी उम्मीद बची रहती है. सब लोग बुरे हैं और दुनिया बद से बदतर होती जा रही है, ऐसा सोचते रहने पर आपको अच्छी चीजें दिखना वाकई कम हो जाएंगी.  

6. छुट्टी लीजिये और कहीं घूमने निकल जाइये. हर शहर के पास 50-100 किलोमीटर के दायरे में ऐसा बहुत कुछ होता है जिससे हम अनजान होते हैं. कभी-कभी बच्चों की गर्मियों की छुट्टी या पिकनिक जैसा वक्त बिताइए, जब किसी काम को करने की कोई फिक्र न हो.   

7. माफ़ करना सीखिए. किसने आपके साथ किस दिन क्या किया… यह सब याद रखके आप उसका क्या लेंगे? हर क्लास में वह बच्चा और हर ऑफिस में वह व्यक्ति लोगों का पसंदीदा होता है जो कोई बात अपने दिल में नहीं रखता और दूसरों की बातों को नज़रअंदाज़ करके उनसे हिलमिल कर रहता है. यदि आप ऐसा कर पाते हैं तो आपके करीबी लोगों पर इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ता है और वे भी इस गुण को अपना सकते हैं.  

8. नए लक्ष्य बनाइये, नयी चीज़ें सीखिए. हर रोज़ एक नया लक्ष्य, बच्चों जैसा. यदि लेखक बनना चाहते हों तो एक नोटबुक साख रखकर उसमें अपने विचार नोट करने लगें. यदि फोटोग्राफी करते हों और बढ़िया कैमरा खरीदा हो तो तय कर लें कि रोज़ कम से कम एक फोटो ज़रूर खींचेंगे और नई टेक्नीक सीखेंगे. इसे 365 Project कहते हैं. आपको जो करना पसंद हो, आप जो सीखना चाहते हों, उसके लिए अपना पर्सनल प्रोजेक्ट बनाइए और अपनी प्रगति को शेयर करते रहें, इससे आप एक तरह के पॉज़िटिव प्रेशर में रहेंगे और आलस नहीं करेंगे.  

9. कुछ शारीरिक व्यायाम कीजिये. फिटनेस का भूत सवार होने पर लोग एक ही दिन में कई मील दौड़ने जैसा अव्यावहारिक काम करके जल्द ही डिमॉरेलाइज़ हो जाते हैं. यदि बहुत लंबे अरसे से एक्सरसाइज़ न की हो तो शुरुआत जल्दी उठने और पार्क के कुछ राउंड लगाने से करें. धीरे-धीरे अपनी सैर या दौड़-भाग का दायरा और समय बढ़ाते जाएं. ये गतिविधि आपको स्वस्थ भी रखेगी और नींद भी आएगी. यदि कोई शारीरिक तकलीफ़ या बीमारी आपको व्यायाम न करने दे रही हो तो एक ही स्थान पर किए जा सकने वाला योगाभ्यास या ध्यान करें.   

10. कोई जानवर पाल लीजिये. कुत्ता पालना सबसे बेहतर रहता है क्योंकि लोग उनसे लगाव का अनुभव करते हैं और वे मालिक को चहलकदमी भी खूब कराते हैं. बच्चों का पालतू से लगाव तो आपने देखा होगा! आजकल शहरों में लोग अकेले होते जा रहे हैं. कोई पेट रखने से लोग इमोशनली संभले रहते हैं.   

11. काम से कभी फ़ुर्सत लीजिये. ऑफिस से लौटते ही लैपटॉप या फोन में घुस जाना आपको अखरता नहीं है? बच्चे भी कभी-कभी बस्ता फेंक देते हैं जनाब! कामकाज के भीषण दबाव और टारगेट पूरा करने के तनाव के कारण कितने ही लोग बीमारियों और बुरे हालातों का शिकार हो रहे हैं.   ऐसी कई रोजाना थोड़ी पॉजिटिव सलाह देने वाली वेब साईट होती हैं, ज्यादातर अंग्रेजी में हैं, मगर दस बारह लाइन तो पढ़ ही सकते हैं! हिंदी में पढ़ना हो तो हिंदीज़ेन है ही! प्रेरक लेखों की आर्काइव में आपको बहुत अच्छे लेख पढ़ने को मिलेंगे.  

रविवार, 7 जून 2015

बने रहने दो इन्सान ही


मैंने तो साफ़-साफ़ कह दिया आज सबसे
मशीन तो नहीं बन पाऊंगा मैं
मुझे बने रहने दो इन्सान ही
रही बात कमाने-खाने और खिलाने की
तो वह जिम्मेदारी भी निभाऊंगा बखूबी मैं
पाल लूँगा अपना और अपने परिवार का पेट भी
इन्सान बने रहकर ही
खूब हंसो, खूब खिल्ली उड़ाओ मेरी सब मिलकर
मुझे बिलकुल भी बुरा नहीं लग रहा
क्योंकि आपकी अज्ञानता दिख रही है सिर्फ मुझे
आप तो आपने आप को समझ बैठे हैं महान ज्ञानी
तो हे ज्ञानियों क्या आप नहीं जीने देंगे एक इंसान को
इंसान बनकर इस दुनिया में!
क्या आपकी नजर में सफलता की परिभाषा
सिर्फ इतनी सी ही है कि कमाओ ढेर सारे पैसे
भर दो अपना घर कृत्रिम वस्तुओं से
ओढ़ लो लबादा सभ्य-सामाजिक होने का
चाहे भले ही दम घुटता रहे तुम्हारा उस लबादे में
और वही बनाना चाहते तुम मुझे भी
नहीं मैं अब नहीं सुनूंगा तुम्हारी
करूँगा कुछ अपने ही मन की
कौन सा बार-बार मिलता है
यह इंसानों का जीवन
जिऊंगा मैं तो इसे अपने ही ढंग से
करते रहो तुम सब मिलकर विलाप
मुझे तो जीना है खुश रहकर ही
अन्दर से भी और बाहर से भी

                   (कृष्ण धर शर्मा, २०१५)