रविवार, 5 नवंबर 2017

डॉ आईदान सिंह भाटी की कुछ कवितायें


क्रांति
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वह आएगी
पर आएगी किसी की पीठ पर चढ़कर
क्यों कि वह है लंगड़ी
सब इन्तज़ार कर रहे हैं उसका ;
आकाश से नहीं
दिलों में उठ रहे हैं बवंडर
उथल-पुथल मची हुई है
लोग उठाने लगे हैं
राज्य, धर्म पर अँगुली ।


कभी तो
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कभी तो भूलो
बच्चों को भूगोल पढ़ाना
हँसो गड़गड़ हँसी ।
हँसो !
जिससे बज उठें हिय के तार ।
पहली बारिश से जैसे पनपते हैं
वर्षों से सूखे-थार में पुष्प पल्लव ।
तुम्हारे हँसते ही
हँसने लगेगा
चूल्हे पर तपता तवा
और तवे पर सिकती हुई रोटी ।
तुम्हारे हँसते ही
खिल उठेंगे
बेलों पर फूल ।
खेजड़ों पर मिमंझर
और बच्चों की आँखों में भूगोल
(ज़रूरत नहीं रहेगी फिर तुम्हें भूगोल रटाने की)
कभी तो बनाओ
मन को चिड़िया
जंगल का विहाग
घर आँगन की गौरैया ।
उड़ो आकाश में
ऊँचे और ऊँचे
बताओ बच्चों को आकाश और
ऊँचाई का अर्थ ।
कभी ‘फ्लैट’ की पाँचवीं मंज़िल में
बच्चों के सामने बन जाओ ऐसे
जैसे हुड़दंग करते थे बचपन में
फससों और चौपालों पर ।
भूलो कभी तो कुछ ज़रूरी बातें
बदलो पुरानी पुस्तकों के पन्ने
पढ़ो वह आखर माल
जिसके नीचे कभी खींची थी लकीरें ।
(लकीरें जिनमें छुपे हैं उस समय के अर्थ)
आँखें खोलो और देखो
अभी तक आते हैं
रोहिड़ों पर लाल फूल
वर्षा ऋतु में हरियल होता है
धरती का आँगन
हरे होते हैं सूखे ठूँठ
आज तक ।
आकाश में अभी तक उगता है वह तारा
जिसे तुम बचपन में निहारा करते थे
बाल कथाओं के बीच ।
(अपने बच्चों की आँखों में उगाओ वह तारा)
उछलो बछड़ो की भाँति
सुनहरे धोरों पर जा कर
कभी तो
कभी तो वे काम भी करो
जिनको करने से डरने लगे हो
आजकल ।

                    (राजस्थानी से अनुवाद : मोहन आलोक)

निर्मला पुतुल की एक कविता

उतनी दूर मत ब्याहना बाबा ! 
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बाबा!
मुझे उतनी दूर मत ब्याहना
जहाँ मुझसे मिलने जाने ख़ातिर
घर की बकरियाँ बेचनी पड़े तुम्हे

मत ब्याहना उस देश में
जहाँ आदमी से ज़्यादा
ईश्वर बसते हों
जंगल नदी पहाड़ नहीं हों जहाँ
वहाँ मत कर आना मेरा लगन
वहाँ तो कतई नही
जहाँ की सड़कों पर
मान से भी ज़्यादा तेज़ दौड़ती हों मोटर-गाडियाँ
ऊँचे-ऊँचे मकान
और दुकानें हों बड़ी-बड़ी
उस घर से मत जोड़ना मेरा रिश्ता
जिस घर में बड़ा-सा खुला आँगन न हो
मुर्गे की बाँग पर जहाँ होती ना हो सुबह
और शाम पिछवाडे से जहाँ
पहाडी पर डूबता सूरज ना दिखे ।
मत चुनना ऐसा वर
जो पोचाई और हंडिया में
डूबा रहता हो अक्सर
काहिल निकम्मा हो
माहिर हो मेले से लड़कियाँ उड़ा ले जाने में
ऐसा वर मत चुनना मेरी ख़ातिर
कोई थारी लोटा तो नहीं
कि बाद में जब चाहूँगी बदल लूँगी
अच्छा-ख़राब होने पर
जो बात-बात में
बात करे लाठी-डंडे की
निकाले तीर-धनुष कुल्हाडी
जब चाहे चला जाए बंगाल, आसाम, कश्मीर
ऐसा वर नहीं चाहिए मुझे
और उसके हाथ में मत देना मेरा हाथ
जिसके हाथों ने कभी कोई पेड़ नहीं लगाया
फसलें नहीं उगाई जिन हाथों ने
जिन हाथों ने नहीं दिया कभी किसी का साथ
किसी का बोझ नही उठाया
और तो और
जो हाथ लिखना नहीं जानता हो "ह" से हाथ
उसके हाथ में मत देना कभी मेरा हाथ
ब्याहना तो वहाँ ब्याहना
जहाँ सुबह जाकर
शाम को लौट सको पैदल
मैं कभी दुःख में रोऊँ इस घाट
तो उस घाट नदी में स्नान करते तुम
सुनकर आ सको मेरा करुण विलाप.....
महुआ का लट और
खजूर का गुड़ बनाकर भेज सकूँ सन्देश
तुम्हारी ख़ातिर
उधर से आते-जाते किसी के हाथ
भेज सकूँ कद्दू-कोहडा, खेखसा, बरबट्टी,
समय-समय पर गोगो के लिए भी
मेला हाट जाते-जाते
मिल सके कोई अपना जो
बता सके घर-गाँव का हाल-चाल
चितकबरी गैया के ब्याने की ख़बर
दे सके जो कोई उधर से गुजरते
ऐसी जगह में ब्याहना मुझे
उस देश ब्याहना
जहाँ ईश्वर कम आदमी ज़्यादा रहते हों
बकरी और शेर
एक घाट पर पानी पीते हों जहाँ
वहीं ब्याहना मुझे !
उसी के संग ब्याहना जो
कबूतर के जोड़ और पंडुक पक्षी की तरह
रहे हरदम साथ
घर-बाहर खेतों में काम करने से लेकर
रात सुख-दुःख बाँटने तक
चुनना वर ऐसा
जो बजाता हों बाँसुरी सुरीली
और ढोल-मांदर बजाने में हो पारंगत
बसंत के दिनों में ला सके जो रोज़
मेरे जूड़े की ख़ातिर पलाश के फूल
जिससे खाया नहीं जाए
मेरे भूखे रहने पर
उसी से ब्याहना मुझे ।
                                 (निर्मला पुतुल)

मैथिलीशरण गुप्त की कुछ कवितायें

आर्य
हम कौन थे, क्या हो गये हैं, और क्या होंगे अभी
आओ विचारें आज मिल कर, यह समस्याएं सभी

भू लोक का गौरव, प्रकृति का पुण्य लीला स्थल कहां
फैला मनोहर गिरि हिमालय, और गंगाजल कहां
संपूर्ण देशों से अधिक, किस देश का उत्कर्ष है
उसका कि जो ऋषि भूमि है, वह कौन, भारतवर्ष है
यह पुण्य भूमि प्रसिद्घ है, इसके निवासी आर्य हैं
विद्या कला कौशल्य सबके, जो प्रथम आचार्य हैं
संतान उनकी आज यद्यपि, हम अधोगति में पड़े
पर चिन्ह उनकी उच्चता के, आज भी कुछ हैं खड़े
वे आर्य ही थे जो कभी, अपने लिये जीते न थे
वे स्वार्थ रत हो मोह की, मदिरा कभी पीते न थे
वे मंदिनी तल में, सुकृति के बीज बोते थे सदा
परदुःख देख दयालुता से, द्रवित होते थे सदा
संसार के उपकार हित, जब जन्म लेते थे सभी
निश्चेष्ट हो कर किस तरह से, बैठ सकते थे कभी
फैला यहीं से ज्ञान का, आलोक सब संसार में
जागी यहीं थी, जग रही जो ज्योति अब संसार मेंI
वे मोह बंधन मुक्त थे, स्वच्छंद थे स्वाधीन थे
सम्पूर्ण सुख संयुक्त थे, वे शांति शिखरासीन थे
मन से, वचन से, कर्म से, वे प्रभु भजन में लीन थे
विख्यात ब्रह्मानंद नद के, वे मनोहर मीन थे

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सखि, वे मुझसे कहकर जाते
कह, तो क्या मुझको वे अपनी पथ-बाधा ही पाते?
मुझको बहुत उन्होंने माना
फिर भी क्या पूरा पहचाना?
मैंने मुख्य उसी को जाना
जो वे मन में लाते।
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।
स्वयं सुसज्जित करके क्षण में,
प्रियतम को, प्राणों के पण में,
हमीं भेज देती हैं रण में -
क्षात्र-धर्म के नाते
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।
हु‌आ न यह भी भाग्य अभागा,
किसपर विफल गर्व अब जागा?
जिसने अपनाया था, त्यागा;
रहे स्मरण ही आते!
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।
नयन उन्हें हैं निष्ठुर कहते,
पर इनसे जो आँसू बहते,
सदय हृदय वे कैसे सहते ?
गये तरस ही खाते!
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।
जायें, सिद्धि पावें वे सुख से,
दुखी न हों इस जन के दुख से,
उपालम्भ दूँ मैं किस मुख से ?
आज अधिक वे भाते!
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।
गये, लौट भी वे आवेंगे,
कुछ अपूर्व-अनुपम लावेंगे,
रोते प्राण उन्हें पावेंगे,
पर क्या गाते-गाते ?
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।
                                        मैथिलीशरण गुप्त

नीलाभ की कुछ कवितायें

नाराज आदमी का बयान- १
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मुझे अब किसी भी चीज़ में
दिलचस्पी नहीं रह गई है
न दुनिया में
न उसके मूर्खतापूर्ण कारोबार में
मैं सिर्फ़ एक सीधी, सरल ज़िन्दगी
जीना चाहता हूँ
पसीने की गन्ध को
ताज़ा पानी से मिटाते हुए
दिन भर की थकान को
गा-बजा कर दूर करते हुए
भात की महक में
माँ के दूध का सोंधापन
और दाल में पड़ी खटाई की फाँक में
बचपन की साथिन के होंटों की सनसनी
महसूस करते हुए
सीधी, सरल ज़िन्दगी
जो बीसवीं सदी के
इन आख़िरी वर्षों में
सबसे कठिन चीज़ है
रहे शब्द
तो शैतान ले जाए उन्हें
वे मुझसे नहीं थके
पर मैं
उनसे ऊब गया हूँ

नाराज आदमी का बयान-२
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शब्दों से नाता अटूट है
शब्दों से मेरा नाता अटूट है
मैं उन्हें प्यार करता हूँ
लगातार
लड़ता हूँ झगड़ता हूँ उनसे
अपनी समझ से
उन्हें तरतीब देता रहता हूँ
यहाँ तक कि कई बार
खीझ उठता हूँ उन पर
बहुत बार
मैंने कहा है उनसे
क्यों तंग करते हो मुझे ?
भाई, अब तुम जाओ
कहीं और जा कर डेरा जमाओ
मेरे दिमाग़ को घोंसला मत बनाओ
मगर शब्द हैं कि लगातार
मेरा पीछा करते हैं
मेरे कानों में गूँजते हैं
मेरे दिमाग़ पर दस्तक देते रहते हैं
मैं जानता हूँ
मैं कई बार उन्हें
व्यक्त नहीं कर पाता
उनकी दस्तक के बावजूद
कई बार
मेरे दिमाग़ का कोई दरवाज़ा
नहीं खुल पाता
मैं कुछ और कहना चाहता हूँ
वे कुछ और सुझाते हैं
मैं तराशना चाहता हूँ उन्हें
वे बार-बार
मेरे हाथों को चुभ जाते हैं
कभी मैं आगे बढ़ जाता हूँ
कभी वे पीछे छूट जाते हैं
लेकिन न वे मुझे छोड़ते हैं
न मैं उन से पीछा छुड़ा पाता हूँ
उन्हीं के रिश्ते से मैं ख़ुद को
ज़िन्दगी से जुड़ा पाता हूँ
उन्हीं के रिश्ते से मैं ख़ुद को
ज़िन्दगी से जुड़ा पाता हूँ

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इस दौर में
हत्यारे और भी नफ़ीस होते जाते हैं
मारे जाने वाले और भी दयनीय
वह युग नहीं रहा जब बन्दी कहता था
वैसा ही सुलूक़ करो मेरे साथ
जैसा करता है राजा दूसरे राजा से
अब तो मारा जाने वाला
मनुष्य होने की भी दुहाई नहीं दे सकता
इसीलिए तो वह जा रहा है मारा
अनिश्चय के इस दौर में
सिर्फ़ बुराइयाँ भरोसे योग्य हैं
अच्छाइयाँ या तो अच्छाइयाँ नहीं रहीं
या फिर हो गयी हैं बाहर चलन से
खोटे सिक्कों की तरह
शैतान को अब अपने निष्ठावान पिट्ठुओं को
बुलाना नहीं पड़ता
मौजूद हैं मनुष्य ही अब
यह फ़र्ज़ निभाने को
पहले से बढ़ती हुई तादाद में

                                      (नीलाभ )

चरवाहे का सुख




कौन बनेगा प्रधानमंत्री!
कौन बनेगा मुख्यमंत्री!
या कौन बनेगा राष्ट्रपति!
क्या लेना-देना इन फ़िजूल
बातों से भला एक चरवाहे को
उसके मतलब की बातें तो
होती हैं सिर्फ इतनी सी ही
कि किस तरह से भरा जाए पेट
अपने प्राणों से प्रिय गाय-बैलों का
ताकि जब शाम को लौटना हो
वापस अपने घर के लिए
तो अघाए हुए हों उसके गाय-बैल
उतर सके गायों के थन में दूध
आँखें गड़ाये अपनी माँ का
इन्तजार कर रहे छौनों के लिए

           (कृष्ण धर शर्मा, 10.6.2017)

स्वप्नदीप



कुटिलताओं और आशंकाओं के दौर में
सहजताओं और सरलताओं को बचाए रखना
भले ही इसमें अतिशय धैर्य की होगी आवश्यकता
मगर कुटिलों के कुचक्रों से बचने के लिए
सहनशीलता की पराकाष्ठा के भी पार
सहना होगा तुम्हें उस ताप को उस अग्नि को
जो तुम्हें तपकर अपनी आंच में बना देगी कुंदन 
फिर तुम हो जाओगे इतने खरे
कि तुम्हें खोटा साबित करने के
तमाम प्रयास होंगे असफल
बस, तब तक तुम्हें बचाकर रखने होंगे
अपने हृदय के किसी कोने में
आशाओं के कुछ सुनहरी लौ वाले स्वप्नदीप

                  (कृष्ण धर शर्मा, 22.2.2017)

मंगलवार, 11 अप्रैल 2017

दलाई लामा कुछ वर्ष अरुणाचल क्यों नहीं रहते?


 चीन का एक अद्र्ध सरकारी अखबार ‘ग्लोबल टाइम्स’ ने भारत को नसीहत के साथ-साथ नाकाबिले बर्दाश्त की भी धमकी दी है। वजह दलाई लामा हैं, जिनके अरुणाचल जाने पर चीन को आपत्ति है। तिब्बती धर्म गुरु दलाई लामा 10 अप्रैल तक अरुणाचल प्रदेश में रहेंगे। परम पावन कोई पहली बार अरुणाचल नहीं आये हैं। हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में बस जाने के बाद वे सातवीं बार अरुणाचल भ्रमण पर आये हैं। 24 मार्च से 6 मई 1983 को परम पावन का पहला अरुणाचल दौरा था, तब भी चीन काफी उछला-कूदा था। दलाई लामा का दूसरा दौरा 7 से 16 दिसंबर 1996, तीसरा 7 से 21 अक्टूबर 1997 को हुआ था। 2003 में दो बार 29 अप्रैल से 9 मई, और 11 से 17 दिसंबर को तिब्बती धर्मगुरु का अरुणाचल आना हुआ था। दलाई लामा का छठा अरुणाचल दौरा 8 से 15 नवंबर 2009 को संपन्न हुआ था। चीन, दलाई लामा के हर अरुणाचल दौरे पर भारत को धमका चुका है। उसकी गीदड़ भभकी को क्या गंभीरता से लिए जाने की जरूरत है?
चीन दलाई लामा के हर अरुणाचल दौरे पर दो कारणों से उछलता है। पहला, 1914 का शिमला कन्वेंशन है, जिसके मुताबिक तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने माना था कि दक्षिणी तिब्बत के पड़ोस में बसा तवांग और संपूर्ण अरुणाचल भारत का हिस्सा है। चीन 1914 के शिमला कन्वेंशन को मानने से इंकार करता रहा है। दूसरा, 1959 में विद्रोह के तुरंत बाद दलाई लामा का तिब्बत से महाभिनिष्क्रमण हुआ। 30 मार्च 1959 को वे तवांग आये, और फिर 18 अप्रैल को असम के तेजपुर पहुंचे। कुछ महीने बाद कोई 80 हजार शरणार्थियों के साथ धर्मशाला में तिब्बत की निर्वासित सरकार की स्थापना हुई। अरुणाचल का तवांग एक तारीखी स्थान है, जब भी दलाई लामा इस सूबे में आते हैं, तवांग जरूर जाकर अपनी याद ताजा करते हैं। चीन के इस दर्द को बदस्तूर जारी रखने के लिए दलाई लामा को चाहिए कि वे अरुणाचल ही कुछ वर्ष रहें।
एक आम फहम है कि तिब्बत की निर्वासित सरकार की स्थापना पंडित नेहरू की वजह से हुई। मगर, सच यह है कि इस पूरे खेल को सीआईए के ‘स्पेशल एक्टिविटी डिवीजन’ ने अंजाम दिया था। 1942 से पहले तिब्बत में अंदरूनी दांव-पेंच से शेष दुनिया अनजान थी। तिब्बत में पीत वस्त्र धारी गेलुग (जिसके धर्मगुरु 14वें दलाई लामा हैं), ‘काग्यु’, ‘न्यींगमां’, और शाक्य मत को मानने वाले ग्यालपो धर्मगुरु विभिन्न मठों के जरिये अपना अखंड राज चला रहे थे। 1642 से 1950 तक ल्हासा से लेकर तिब्बत पठार के बड़े हिस्से पर एक से चौदहवें दलाई लामाओं ने राज किया है। बीच में 1705 से 1750 की अवधि को छोडक़र, जब मांचु और छिंग राजाओं का शासन तिब्बत में था।
चीन का मकसद था, बहुसंख्यक गेलुग मतावलंबियों को कमजोर करना। उसने दलाई लामा के विकल्प के रूप में पणछेन लामाओं को तैयार किया। यह किस्सा 1933 का है, जब तेरहवें दलाई लामा की मृत्यु हो चुकी थी। उन दिनों नौवें पणछेन लामा थुब्तेन चोक्यी न्यीमा पांच सौ चीनी सैनिकों और कुछ समर्थक लामाओं के साथ खाम आये और कमजोर मठों को दबाकर सत्ता पर काबिज हो गये। 1942 के बाद च्यांग काई शेक ने तिब्बत में विस्तार देने की नीयत से और भी साजिशें कराईं। फिर भी गेलुग लामा उनके काबू नहीं आ रहे थे।
22 फरवरी 1940 को जब ल्हासा में 14वें दलाई लामा तेन्जिंग ग्यात्सो का राज्याभिषेक हुआ तब वे पांच साल के बालक थे। 17 नवंबर 1950 को वे पन्द्रह वर्ष के हो चुके थे, उस दिन उन्हें गेलुग शासन के राजनीतिक फैसले लेने का अधिकार मिल चुका था। तिब्बत स्वायत्तशासी क्षेत्र के शासक की हैसियत से दलाई लामा के कई पत्र ‘पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना’ को भेजे जाते रहे। 27 सितंबर 1954 को चीनी संसद ‘नेशनल पीपुल्स कांग्रेस’ की स्टैंडिंग कमेटी के ‘वॉइस चेयरमैन’ दलाई लामा बनाये गये। यह दर्शाता है कि तत्कालीन चीनी सरकार दलाई लामा को तिब्बत में बहैसियत शासक की मान्यता दे रही थी। लेकिन च्यांगकाई शेक तिब्बत पर प्रतिरूपी प्रशासक नहीं, प्रत्यक्ष चीनी आधिपत्य चाहते थे।
14वें दलाई लामा को तख्ता पलट का अंदाजा हो चुका था। उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू से इस वास्ते 1956 में मदद भी मांगी थी। परंतु पंडित नेहरू ने 1954 में चीन से हुई संधि का हवाला देकर, प्रत्यक्ष मदद देने से इंकार कर दिया था। पंडित नेहरू नहीं चाहते थे, कि इसे लेकर चीन से टकराव आरंभ हो जाए। इस बीच सीआईए का ‘स्पेशल एक्टिविटी डिवीजन’(एसएडी) ने दलाई लामा का तिब्बत से पलायन का इंतजाम किया। उस समय के अमेरिकी राष्ट्रपति आइजनहॉवर संभवत: पंडित नेहरू को समझा पाने में सफल हुए थे कि तिब्बत की निर्वासित सरकार भविष्य में चीन पर अंकुश का काम करेगी। बाद में जनवरी 1961 में राष्ट्रपति निक्सन सत्ता में आये, तो तिब्बत की निर्वासित सरकार को और भी फंड व ताकत मिली। 1959, 1961, और 1965 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में तिब्बत से संबंधित तीन प्रस्ताव पास किये गये। 21 सितंबर 1987 को अमेरिकी कांग्रेस में तिब्बत को शांति क्षेत्र बनाने संबंधी पांच सूत्री प्रस्ताव पर भी मुहर लगी। इसे लेकर चीन की भृकुटि तनी रही।
तिब्बत को केंद्र में रखकर सीआईए जो कुछ कर रही थी, उसे रूसी एजेंसियां ‘काउंटर’ तो नहीं कर पा रही थीं, मगर समय-समय पर उन गतिविधियों पर से पर्दा उठाने का काम क्रेमलिन की तरफ से होता रहा। रूसी इतिहासकार दिमित्रि बर्खोतुरोव ने कई सारे दस्तावेजों के आधार पर खुलासा किया कि यूएस कांग्रेस ने 1 लाख 80 हजार डॉलर 1964 के ड्राफ्ट बजट में आबंटित किया था। तिब्बत आंदोलन में सीआईए की कितनी गहरी दिलचस्पी रही है, उसका सबसे बड़ा उदाहरण पश्चिमी नेपाल सीमा से लगा तिब्बत का खाम प्रदेश है, जहां 1959 में खंफा युद्ध हुआ था। इसके लिए अमेरिका के कोलराडो स्थित कैंप हाले में 2100 खंफा लड़ाके लाये गये और उन्हें गुरिल्ला युद्ध की ट्रेनिंग देकर नेपाल के बरास्ते वापिस खाम भेजा गया। इस पूरे कार्यक्रम में नौ लाख डॉलर के खर्चे की मंजूरी अमेरिकी कांग्रेस से ली गई थी। जिसमें चार लाख डॉलर कैम्प हाले में व्यय किया गया था।
 बदलते वक्त के साथ तिब्बतियों को सीआईए का सहयोग धीरे-धीरे कम होता गया। 1968 में सूचना मिली कि सीआईए के जरिये तिब्बतियों को बजटीय सहयोग कम करके 11 लाख, 65 हजार डॉलर कर दिया गया था। कुछ कूटनीतिक मानते हैं कि इस सारे खेल के पीछे चीन के प्रथम नाभिकीय परीक्षण को पटरी से उतारना था, जो 16 अक्टूबर 1964 को लोप नूर में संपन्न हुआ था। लोप नूर तिब्बत से सटे शिन्चियांग में हैं, जहां के उईगुर अलगाववादी चीन को चुनौती देते रहे हैं। चीनी मामलों के जानकार जोनाथन मिस्की ने सूचना दी कि 1972 में राष्ट्रपति निक्सन के चीन दौरे के बाद ‘खंफा ऑपरेशन’ के बाद के काम को भी स्थगित कर दिया गया।
6 जुलाई 2017 को 14 वें दलाई लामा 82 साल के हो जाएंगे। उनके तेवर, उम्र के साथ ढीले पडऩे लगे हैं। उनमें बदलाव दो दशक पहले से आरंभ था। 21 सितंबर 1987 को जर्मनी के श्ट्राशबुर्ग में परम पावन ने पांच सूत्री मध्य मार्ग का प्रस्ताव दिया था। जिसमें पूरे तिब्बत को शांति क्षेत्र घोषित करने, चीनी मूल के हान वंशियों को कहीं और शिफ्ट करने, तिब्बत में मानवाधिकार, तिब्बत को नाभिकीय कचरे का ठिकाना बनाने से परहेज करने जैसे लीपापोती वाले प्रस्ताव थे। ऐसे प्रस्ताव से तिब्बत स्वतंत्र हो जाएगा, ऐसा दलाई लामा का कोई अंधभक्त ही सोच सकता है।
दलाई लामा कुछ वर्षों से धर्मगुरु का ब्रांड लेकर विचरण करते रहे हैं। लेकिन उनकी धार्मिक यात्रा पर भी चीन को आपत्ति है। बड़ा सवाल यह है कि इस समय सीआईए तिब्बत के मामले में कितना सक्रिय है? और ट्रंप प्रशासन दलाई लामा के बारे में क्या सोचता है? ट्रंप व्यापारी नेता हैं, और वे स्पष्ट कर चुके हैं कि दुनिया का राजनीतिक मानचित्र बदलने के लिए अमेरिकी टैक्स पेयर्स का पैसा अब और नहीं गलाएंगे। दलाई लामा यों भी चीन के विरूद्ध हथियार डाल चुके हैं। एक-दो मौकों पर जब दलाई लामा ने बयान दिया कि वे ‘वन चाइना पॉलिसी’ का समर्थन करते हैं, तो उन बचे-खुचे लोगों को आश्चर्य हुआ, जिन्होंने तिब्बत की आजादी के वास्ते बड़ी कुर्बानियां दी थीं। क्या दलाई लामा बदल चुके हैं? इस प्रश्न पर निष्पक्ष रूप से चिंतन की आवश्यकता है।
 चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता हुआ चुनयिंग ने बयान दिया कि दलाई लामा के अरुणाचल दौरे से चीन की ‘वन चाइना पॉलिसी’ को धक्का पहुंचा है, और इससे भारत-चीन संबंध प्रभावित होते हैं। तो क्या हम अरुणाचल की कीमत पर ‘वन चाइना पॉलिसी’ को समर्थन दें? अरुणाचल भारत का अभिन्न अंग है, और रहेगा। भाड़ में जाए वन चाइना पॉलिसी! इसके लिए चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग प्रधानमंत्री मोदी के साथ अगली बार झूला झुलने से मना कर दें, तो उसकी परवाह नहीं करनी चाहिए।
चीनी अखबार ग्लोबल टाइम्स ने 6 अप्रैल को नुमाया संपादकीय ‘इंडिया यूज दलाई लामा कार्ड’ को बड़े ही नकारात्मक ढंग से प्रस्तुत किया है। उसकी टिप्पणी थी, ‘एनएसजी का सदस्य नहीं बन पाने, और यूएन में मसूद अजहर को आतंकी लिस्ट में शामिल न करा पाने का हिसाब भारत दलाई लामा के जरिये चुकता कर रहा है।’ संपादकीय लिखने वाला जैसे सीमा पर खड़ा ललकार रहा हो, ‘अगर नई दिल्ली ‘साइनो-इंडिया’ संबंध को खराब करता है, और दोनों देश प्रतिद्वंद्वी के रूप में आमने-सामने होते हैं, तो क्या भारत उसके दुष्परिणामों को झेल पायेगा? इसलिए राष्ट्रवादी मित्रों, इस देश में सिर्फ एक बार चीनी माल की बिक्री संपूर्ण रूप से बंद करा दीजिए। चीन इस आर्थिक झटके को झेल नहीं पायेगा!

पुष्परंजन
pushpr1@rediffmail.com)

शुक्रवार, 17 मार्च 2017


आमेर का किला जयपुर 
राजस्थान का  उपनगर आमेर  4 वर्ग किलोमीटर (1.5 वर्ग मीटर) में फैला एक शहर है जो भारत के राजस्थान राज्य के जयपुर से 11 किलोमीटर दुरी पर स्थित है. यह किला ऊँचे पर्वतो पर बना हुआ है, असल में आमेर शहर को मीनाओ ने बनवाया था और बाद में राजा मान सिंह प्रथम ने वहा शासन किया. यह जयपुर के प्रमुख पर्यटन स्थलों में से एक है, जो कि पहाड़ी पर स्थित है। आमेर दुर्ग का निर्माण राजा मान सिंह-प्रथम ने करवाया था। आमेर दुर्ग हिन्दू तत्वों की अपनी कलात्मक शैली के लिए जाना जाता है। अपनी विशाल प्राचीर, दरवाजों की श्रंखला और लम्बे सर्पिलाकार रास्ते के साथ यह अपने सामने की ओर स्थित मावठा झील की ओर देखता हुआ खड़ा है।
इस अजेय दुर्ग का सौंदर्य इसकी चारदीवारी के भीतर मौजूद इसके चार स्तरीय लेआउट प्लान में स्पष्ट दिखाई पड़ता है, जिसमें लाल बलुआ पत्थर और संगमरमर से निर्मित दीवान-ऐ-आम या "आम जनता के लिए विशाल प्रांगण", दीवान-ऐ-ख़ास या "निजी प्रयोग के लिए बना प्रांगण", भव्य शीश महल या जय मंदिर तथा सुख निवास शामिल हैं, जिन्हें गर्मियों में ठंडा रखने के लिए दुर्ग के भीतर ही कृत्रिम रूप से बनाये गए पानी के झरने इसकी समृद्धि की कहानी कहते हैं। इसीलिये, यह आमेर दुर्ग "आमेर महल" के नाम से भी जाना जाता है। राजपूत महाराजा अपने परिवारों के साथ इस महल में रहा करते थे। महल के प्रवेश द्वार पर, किले के गणेश द्वार के साथ चैतन्य सम्प्रदाय की आराध्य माँ शिला देवी का मंदिर स्थित है।
यह आमेर का किलाजयगढ़ दुर्ग के साथ, अरावली पर्वत श्रृंखला पर चील के टीले के ठीक ऊपर इस प्रकार स्थित है कि ये दो अलग अलग किले होते हुए भी समग्र रूप में एक विशाल संरचना का रूप लेते हुए दिखाई पड़ते हैं क्योंकि दोनों किले ना सिर्फ एक दूसरे के बेहद करीब स्थित हैं, बल्कि एक सुरंग के रास्ते से दोनों एक दूसरे से जुड़े हुए भी हैं। आमेर के किले से जयगढ़ के किले तक की यह सुरंग इस उद्देश्य से बनायी गयी थी कि युद्ध के समय में राज परिवार के लोग आसानी से आमेर के किले से जयगढ़ के किले में पहुँच सकें, जो कि आमेर के किले की तुलना में अधिक दुर्जेय है।
यह मुगलों और हिन्दूओं के वास्तुशिल्प का मिलाजुला और अद्वितीय नमूना है। जयपुर से पहले कछवाहा राजपूत राजवंश की राजधानी आमेर ही थी। राजा मानसिंह जी ने वर्ष १५९२ में इसका निर्माण आरंभ किया था। पहाड़ी पर बना यह महल टेढ़े मेढ़े रास्तों और दीवारों से पटा पड़ा है। महल के पीछे से जयगढ दिखाई देता है। महल को बनाने में लाल पत्थरों और सफ़ेद मार्बल का बहुत अच्छे से उपयोग किया गया है। महल के कई अनुभाग देखने योग्य हैं।

महल में जय मंदिर, शीश महल, सुख निवास और गणेश पोल देखने और घूमने के अच्छे स्थान हैं। इन्हें समय-समय पर राजा मानसिंह ने दो सदी के शासन काल के दौरान बनवाया था। आमेर का पुराना नगर महल के पास नीचे की ओर बसा था। यहाँ का जगत शिरोमणि मंदिर, नरसिंह मंदिर देखने योग्य हैं।

आमेर का किला, कला का एक सुंदर नमूना भी है। यहाँ पर बहुत सी फिल्मों की शूटिंग भी होती है।






आमेर का किला विश्व धरोहर
राजस्थान सरकार ने जनवरी २०११ को राजस्थान के कुछ किलों को विश्व धरोहर में शामिल करने के लिए प्रस्ताव भेजा था। उसके बाद यूनेस्को टीम की आकलन समिति के दो प्रतिनिघि जयपुर आए और एएसआई व राज्य सरकार के अघिकारियों के साथ बैठक की। इन सबके पश्चात मई २०१३ में इसे विश्व धरोहर में शामिल कर लिया गया।

आमेर जयपुर नगर सीमा मे ही स्थित उपनगर है, इसे मीणा राजा आलन सिंह ने बसाया था, कम से कम 967 ईस्वी से यह नगर मौजूद रहा है, इसे 1037 ईस्वी मे राजपूत जाति के कच्छावा कुल ने जीत लिया था। आमेर नगरी और वहाँ के मंदिर तथा किले राजपूती कला का अद्वितीय उदाहरण है। यहाँ का प्रसिद्ध दुर्ग आज भी ऐतिहासिक फिल्मों के निर्माताओं को शूटिंग के लिए आमंत्रित करता है। मुख्य द्वार गणेश पोल कहलाता है, जिसकी नक्काशी अत्यन्त आकर्षक है। यहाँ की दीवारों पर कलात्मक चित्र बनाए गए थे और कहते हैं कि उन महान कारीगरों की कला से मुगल बादशाह जहांगीर इतना नाराज़ हो गया कि उसने इन चित्रों पर प्लास्टर करवा दिया। ये चित्र धीरे-धीरे प्लास्टर उखड़ने से अब दिखाई देने लगे हैं। आमेर में ही है चालीस खम्बों वाला वह शीश महल, जहाँ माचिस की तीली जलाने पर सारे महल में दीपावलियाँ आलोकित हो उठती है। हाथी की सवारी यहाँ के विशेष आकर्षण है, जो देशी सैलानियों से अधिक विदेशी पर्यटकों के लिए कौतूहल और आनंद का विषय है।





नाम का स्रोत

प्राचीन काल में आमेर को अम्बावती, अमरपुरा तथा अमरगढ़ के नाम से जाना जाता था। कुछ लोगों को कहना है कि अम्बकेश्वर भगवान शिव के नाम पर यह नगर "आमेर" बना, परन्तु अधिकांश लोग और तार्किक अर्थ अयोध्या के राजा भक्त अम्बरीश के नाम से जोड़ते हैं। कहते हैं भक्त अम्बरीश ने दीन-दुखियों के लिए राज्य के भरे हुए कोठार और गोदाम खोल रखे थे। सब तरफ़ सुख और शांति थी परन्तु राज्य के कोठार दीन-दुखियों के लिए खाली होते रहे। भक्त अम्बरीश से जब उनके पिता ने पूछताछ की तो अम्बरीश ने सिर झुकाकर उत्तर दिया कि ये गोदाम भगवान के भक्तों के गोदाम है और उनके लिए सदैव खुले रहने चाहिए। भक्त अम्बरीश को राज्य के हितों के विरुद्ध कार्य करने के लिए आरोपी ठहराया गया और जब गोदामों में आई माल की कमी का ब्यौरा अंकित किया जाने लगा तो लोग और कर्मचारी यह देखकर दंग रह गए कि कल तक जो गोदाम और कोठार खाली पड़े थे, वहाँ अचानक रात भर में माल कैसे भर गया।

भक्त अम्बरीश ने इसे ईश्वर की कृपा कहा। चमत्कार था यह भक्त अम्बरीश का और उनकी भक्ति का। राजा नतमस्तक हो गया। उसी वक्त अम्बरीश ने अपनी भक्ति और आराधना के लिए अरावली पहाड़ी पर इस स्थान को चुना, उनके नाम से कालांतर में अपभ्रंश होता हुआ अम्बरीश से "आमेर" या "आम्बेर" बन गया।







देवी मंदिर



आम्बेर देवी के मंदिर के कारण देश भर में विख्यात है। शीला-माता का प्रसिद्ध यह देव-स्थल भक्तों की मनोकामना पूर्ण करने, देवी चमत्कारों के कारण श्रद्धा का केन्द्र है। शीला-माता की मूर्ति अत्यंत मनोहारी है और शाम को यहाँ धूपबत्तियों की सुगंध में जब आरती होती है तो भक्तजन किसी अलौकिक शक्ति से भक्त-गण प्रभावित हुए बिना नहीं रहते। देवी की आरती और आह्वान से जैसे मंदिर का वातावरण एकदम शक्ति से भर जाता है। रोमांच हो आता है, रोंगटे खड़े हो जाते हैं और एक अजीब सी सिहरन सारे शरीर में दौड़ जाती है। पूरा माहौल चमत्कारी हो जाता है। निकट में ही वहाँ जगत शिरोमणि का वैष्णव मंदिर है, जिसका तोरण सफ़ेद संगमरमर का बना है और उसके दोनों ओर हाथी की विशाल प्रतिमाएँ हैं।
 शीश महल


इसकी भीतरी दीवारों, गुम्बदों और छतों पर शीशे के टुकड़े इस प्रकार जड़े गए हैं कि केवल कुछ मोमबत्तियाँ जलाते ही शीशों का प्रतिबिम्ब पूरे कमरे को प्रकाश से जगमग कर देता है।
आम्बेर का किला अपने शीश महल के कारण भी प्रसिद्ध है। इसकी भीतरी दीवारों, गुम्बदों और छतों पर शीशे के टुकड़े इस प्रकार जड़े गए हैं कि केवल कुछ मोमबत्तियाँ जलाते ही शीशों का प्रतिबिम्ब पूरे कमरे को प्रकाश से जगमग कर देता है। सुख महल व किले के बाहर झील बाग का स्थापत्य अपूर्व है।
भक्ति और इतिहास के पावन संगम के रूप में स्थित आमेर नगरी अपने विशाल प्रासादों व उन पर की गई स्थापत्य कला की आकर्षक पच्चीकारी के कारण पर्यटकों के लिए आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है। पत्थर के मेहराबों की काट-छाँट देखते ही बनती है। यहाँ का विशेष आकर्षण है डोली महल, जिसका आकार उस डोली (पालकी) की तरह है, जिनमें प्राचीन काल में राजपूती महिलाएँ आया-जाया करती थीं। इन्हीं महलों में प्रवेश द्वार के अन्दर डोली महल से पूर्व एक भूल-भूलैया है, जहाँ राजे-महाराजे अपनी रानियों और पट्टरानियों के साथ आँख-मिचौनी का खेल खेला करते थे। कहते हैं महाराजा मान सिंह की कई रानियाँ थीं और जब राजा मान सिंह युद्ध से वापस लौटकर आते थे तो यह स्थिति होती थी कि वह किस रानी को सबसे पहले मिलने जाएँ। इसलिए जब भी कोई ऐसा मौका आता था तो राजा मान सिंह इस भूल-भूलैया में इधर-उधर घूमते थे और जो रानी सबसे पहले ढूँढ़ लेती थी उसे ही प्रथम मिलन का सुख प्राप्त होता था।
यह कहावत भी प्रसिद्ध है कि अकबर और मानसिंह के बीच एक गुप्त समझौता यह था कि किसी भी युद्ध से विजयी होने पर वहाँ से प्राप्त सम्पत्ति में से भूमि और हीरे-जवाहरात बादशाह अकबर के हिस्से में आएगी तथा शेष अन्य खजाना और मुद्राएँ राजा मान सिंह की सम्मति होगी। इस प्रकार की सम्पत्ति प्राप्त करके ही राजा मान सिंह ने समृद्धशाली जयपुर राज्य का संचलन किया था। आमेर के महलों के पीछे दिखाई देता है नाहरगढ़ का ऐतिहासिक किला, जहाँ अरबों रुपए की सम्पत्ति ज़मीन में गड़ी होने की संभावना और आशंका व्यक्त की जाती है।




आमेर किले की कुछ रोचक बाते

1. आमेर का नामकरण अम्बा माता से हुआ था, जिन्हें मीनाओ की देवी भी कहा जाता था.
2.
आमेर किले की आतंरिक सुंदरता में महल में बना शीश महल सबसे बड़ा आकर्षण है.
राजपूतो के सभी किलो और महलो में आमेर का किला सबसे रोमांचक है.
3.
आमेर किले की परछाई मौटा झरने में पड़ती है, जो एक चमत्कारिक परियो के महल की तरह ही दीखता है.
4.
किले का सबसे बड़ा आकर्षण किले के निचे है जहा हाथी आपको आमेर किले में ले जाते है. हाथी की सैर करना निश्चित ही सभी को आकर्षित करता है.
5.
अम्बेर में स्थापित, जयपुर से 11 किलोमीटर की दुरी पर स्थित आमेर किला कछवाह राजपूतो की राजधानी हुआ करती थी, लेकिन जयपुर के बनने के बाद जयपुर उसकी राजधानी बन गयी थी.
6.
महल का एक और आकर्षण चमत्कारिक फूल भी है, जो एक मार्बल का बना हुआ है और जिसे साथ अद्भुत आकारो में बनाया गया है. मार्बल द्वारा बनी यह आकृति सभी का दिल मोह लेती है.
7.
महल का एक और आकर्षण प्रवेश द्वार गणेश गेट है, जिसे प्राचीन समय की कलाकृतियों और आकृतियों से सजाया गया है.
8.
जयगढ़ किले और आमेर किले के बीच एक 2 किलोमीटर का गुप्त मार्ग भी बना हुआ है. पर्यटक इस रास्ते से होकर एक किले से दूसरे किले में जा सकते है.



साभार- विकिपीडिया व् अन्य स्रोत